September 28, 2021

MotherlandPost

Truth Always Wins!

अस्थिरता में सार्थक जीवन की तलाश – अदिति

इस लॉकडाउन में मनुष्य उन बातों से रूबरू हुआ जो अमूमन वो अनदेखा कर दिया करता था। इन हालातों ने लोगों को परिस्थितियों के आगे घुटने टेकने को भी विवश कर दिया।

इन परिस्थितियों से उबर पाना सरल होता अगर हमारे पास हमारे प्रियजनों का साथ होता। पर क्या यह सच है? यह निरी मिथ्या है। अब मनुष्य केवल इतना ही कर सकता है कि वह जीवित रहने के सभी सवालों से अकेला जूझे और अपनी जीवनशैली और विचार को पूरी तरह बदल दे। हां यह ज़रूर है कि इसमें हमें अपने प्रियजनों की आवश्यकता है पर यह परिवर्तन वे बाहर से नहीं गढ़ सकते, यह केवल आप ही अपने भीतर सृजित कर सकते हैं।

“जीवन जीने की सारी कला छोड़ देने और पकड़े रहने के बारीक़ मेल में निहित है।”

जीवन जीने की कला इंसान के भीतर ही शामिल है। निर्मलता के शुद्ध पानी में गोते लगाने की क्षमता, नकारात्मकता व प्रतिकूल परिस्थितियों से जन्मा मलिन व्यक्तित्व और चिरस्थाई आनंद की तलाश ही जीवन का सत्य है। अन्य सभी कुछ इनकी प्रतिक्रिया मात्र है। जीवन जीने की कला किसी को बाहरी प्रयासों से सिखाई नहीं जा सकती। आत्मा की शांति और बेहतर करने का यह भरोसा उसी व्यक्ति के प्रयासों से उपजता है जिसके बाद सब ईश्वर के ज़िम्मे है।

 

 

इन दिनों अगर हम गूगल पर सर्च करें तो पाएंगे कि लॉकडाउन की अवधि में सबसे ज़्यादा लोगों ने अकेलेपन, डिप्रेशन और दुख आदि का उपाय खोजा है। अलग-अलग सर्च इंजनों पर लोगों ने इन परिस्थितियों से लड़ने के तरीके तलाशे हैं। सामाजिक दूरी की इस नई परंपरा ने लोगों को न केवल एक दूसरे से दूर कर दिया बल्कि उनके दिल टूटने का कारण भी बनी। कई अभिनेताओं, छात्रों और लोगों ने इस अंतहीन युद्ध के आगे घुटने टेक दिए और बीच में ही मैदान छोड़ दिया।

पहली बात तो यह कि लोगों को यह समझने की ज़रूरत है यह लॉकडाउन, अनलॉक, महामारी और वायरस अमर नहीं हैं। सब कुछ ठीक हो जाएगा बस उसमें ज़रा समय लगेगा। धैर्य और संरक्षण से ही अच्छा मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य क़ायम रखा जा सकता है।

मैं समझ नहीं पाती कि लोगों को हर चीज़ में इतनी जल्दीबाज़ी क्यों है। जैसे कि जब यह सब शुरू हुआ तब लोग लॉकडाउन के लिए बेहद उत्सुक थे और यह मानते थे कि वह इस समय का सबसे ज्यादा लाभ उठा सकते हैं पर कुछ समय बाद ही वे इन सबका अंत चाहने लगे। यह सब हमारी दिमाग़ी बनावट और जीवन शैली के बारे में है। कई लोगों को इस लॉकडाउन में कमाल के अनुभव भी हुए।

इस लॉकडाउन के दौरान जीने की कला स्वयं को नए प्रकार के खाँचे में ढालती है। जिसमें अपनी व्यस्त दैनिक दिनचर्या को बदलने से लेकर अधिक उपलब्धियों और शांति के साथ एक सरल जीवन जीने की लालसा शामिल है।

सुबह छह बजे के आसपास उठने से लेकर कसरत या सैर करना जो पुराने दिनों में संभव नहीं था वो इस दिनचर्या का हिस्सा है। एक साथ खाना बनाना व सभी घरवालों का अलग-अलग व्यंजनों में हाथ आज़माना, रूठने मनाने का दौर और इन सबसे लोगों के बीच संबंध मज़बूत होते हैं।

यह पुरानी यादों को संजोने का समय है। प्रियजनों के साथ गलियों में घूमना और एक बार फिर से पुरानी यादों को महसूस करना एक ऐसा स्वर्गीय अनुभव है जो यह लॉकडाउन हमें तोहफ़े में देता है। घर का काम तब और भी आसान हो जाता है जब हाँथ बटाने वालों की संख्या बढ़ जाती है। भले ही हम अपने दोस्तों से शारिरिक तौर पर दूर हुए हों पर इन सबने ने हमें अपने परिवार के सदस्यों से घनिष्ठता बनाने में मदद की।

 

 

यह अवधि हमसे घर के अंदर रहने, स्वस्थ खाने और सामाजिक दूरी के मानदंडों को बनाए रखने की मांग करती है। लेकिन यह हमें उनसे जुड़ने से नहीं रोकता है। हम हमेशा सोचते हैं कि वे हमसे दूर हैं लेकिन यह सच नहीं है, वे सिर्फ एक कॉल या मैसेज दूर हैं। हम हमेशा से यही चाहते हैं कि दूसरा पहल करे और उनके ऐसा न करने पर हममें मनमुटाव उपजता है। क्यों आप ख़ुद मोबाइल फ़ोन नहीं उठाते और यह ज़ाहिर करते कि आप क्या महसूस कर रहे हैं। संभव है उन्हें भी इसी तरह का आभास होता हो पर वे किसी से कह न सकें हों।

यह अवसाद और अकेलापन भी ज्ञान और मनोरंजन से भरी किताब सी दुनियाँ के दुश्मन हैं जो हमें मनचाहे विषय चुनने से रोकते हैं।

अपने आप को डिटॉक्सीफ़ाई करने के लिए एक अच्छी और स्वस्थ दिनचर्या होनी चाहिए जिसमें व्यायाम के लिए एक अलग समय, स्वस्थ भोजन और एक अच्छी किताब शामिल हो जो हम पर एक अमिट छाप छोड़ दे। कुछ अच्छी चीजें देखना और अपनी रुचि के अनुसार अच्छी या दिलचस्प ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होना भी अच्छा है। पढ़ाई, दोस्तों और शिक्षकों से ऑनलाइन जुड़ना और बेहतर उद्देश्य के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल करना इसे सार्थक बनाता है।

इस लॉकडाउन में जीवित रहने के लिए बागवानी, पौधों से बातें करना, मेडिटेशन और खुद को व्यस्त रखना ही एकमात्र कुंजी है। लॉकडाउन की अवधि समाप्त होने के बाद सभी लोगों के पास कम से कम अपने दम पर जीवित रहने का अनुभव होगा। अधिकांश लोगों ने कुछ न कुछ सीखा होगा और उनमें एक नया कौशल विकसित हुआ होगा।

कई लोगों की आकांक्षाएं बड़ी होंगी और वे इस महामारी के दौरान हुए नुकसान या नुकसान को दूर करने की कोशिश कर रहे होंगे। हम सभी ने तनाव, चिंता, अवसाद, अकेलापन और निश्चित रूप से वायरस से निपटने की कोशिश की है। सभी लोगों की सुरक्षा के लिए सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों का पालन अनिवार्य होना चाहिए।

भोजन, रेस्तरां और सब कुछ खुला होना चाहिए लेकिन सीमित मेहमानों और कर्मचारियों के साथ। लेकिन कुछ चीजें जो हमें इस लॉकडाउन से सीखकर अपने भीतर उतारने की ज़रुरत है तो वह है मेडिटेशन, एक स्वस्थ जीवन शैली, कोई कौशल सीखने की आदत और खुद को बनाए रखने की क्षमता और अपने प्रियजनों के साथ एक अच्छी बॉन्डिंग। सभी बूढ़े और जवान जो एक साथ रह रहे हैं और इस कोविड-19 महामारी से लड़ रहे हैं, उन्होंने साबित कर दिया कि वे न केवल अपने प्रियजनों से बल्कि अपने देश से भी प्यार करते हैं।

“सबकुछ अस्थिरता में शांति की तलाश पर केंद्रित है।”

लेखक- अदिति राज (एमिटी विश्वविद्यालय की छात्रा)

Translate »