Wednesday, August 3, 2022

MOTHER LAND POST

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मेडल जीतने के बावजूद चीन के खिलाड़ियों को क्यों होना पड़ रहा है कड़ी आलोचना का शिकार?

by Disha
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तोक्यो ओलंपिक में पदक जीतने वाले चीनी खिलाड़ियों को उनकी जीत के बावजूद कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है। बीते हफ़्ते जब चीन की मिक्स्ड डबल्स टीम ने टेबल टेनिस में सिल्वर मेडल जीता तब उन्होंने रोकर अपने देश की जनता से माफ़ी माँगी।

समाचार एजेंसी बीबीसी के मुताबिक़ चीन की महिला टेबल टेनिस खिलाड़ी लिउ शाइवेन ने इस जीत पर कहा, “ऐसा लगता है कि मैंने टीम का सिर नीचा किया है… मैं सबसे माफ़ी माँगती हूँ।”
उनके पार्टनर शू शिन ने कहा, “पूरे देश की नज़रें इस फ़ाइनल पर थीं। मुझे लगता है कि चीनी टीम ये रिज़ल्ट नहीं स्वीकार सकती।”

चीन में प्रचलित सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीबो पर एक यूज़र ने लिखा कि टेबल टेनिस के खिलाड़ियों ने हमारे देश का सिर नीचा किया है।

Reuters

 

अव्वल न आये यानी देश को धोखा दिया

इस खेल के बाद रेफ़री पर यह भी आरोप लगा कि उनका झुकाव जापानी टीम की ओर था जिस कारण उन्होंने यह फ़ैसला सुनाया।

दरअसल बीते कुछ वर्षों में चीन में राष्ट्रवाद का बुख़ार तेज़ी से चढ़ा है। यही कारण है कि चीनी जनता के लिए ओलंपिक खेल किसी खेल से ज़्यादा महत्ता रखते हैं।

विशेषज्ञों ने बीबीसी से बातचीत में कहा, ‘अति राष्ट्रवादी’ चीनियों के लिए ओलंपिक मेडल मिस करने का मतलब है कि ‘आप देशभक्त नहीं हैं।’

 

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प्रतिक्रियाएँ यह भी आती रही हैं कि चीनी जनता के एक तबके के लिए ओलंपिक मेडल टैली देश की क्षमता और प्रतिष्ठा का रियल टाइम ट्रैकर होता है और इसीलिए उनकी नज़रें इसपर गड़ी होती हैं।

नीदरलैंड्स के लीडेन एशिया सेंटर के डॉक्टर फ़्लोरियन श्नाइडर कहते हैं, “इस संदर्भ में देखें तो अगर कोई खिलाड़ी दूसरे देश की टीम से हार जाता है तो माना जाता है कि उसने देश का सिर नीचा किया है- या यहाँ तक कि उसने देश को धोखा दिया है।”

टेबल टेनिस में जापान के हाँथों गोल्ड मेडल खोने के बाद चीन में एक अलग तरह का आक्रोश देखा गया। इसके पीछे का कारण है दोनों देशों का इतिहास। 1931 से पहले उत्तरी चीन के मंचूरिया पर जापान का अधिपत्य था जिसे लेकर बड़े पैमाने पर युद्ध हुआ था, जिनके चलते लाखों चीनी सैनिकों ने अपनी जान गँवाई थी। यह बात आज भी दोनों देशों के रिश्तों में तल्ख़ी का कारण बनीं हुई है।

इस खेल के बाद चीन की जनता ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म वीबो पर जापान विरोधी बातों की बाढ़ सी आ गई और दोनों खिलाड़ियों को ख़ूब भला-बुरा कहा गया।

 

ताइवान से हार पर आक्रोश

ऐसा नहीं है कि चीनी “राष्ट्रवादियों” को केवल जापान के खिलाड़ी नहीं सुहाते। चीन के ली जुनहुई और लिउ यूचेन को लोगों ने इसलिए निशाना बनाया क्योंकि वो बैडमिंटन डबल्स के फ़ाइनल में ताइवान के खिलाड़ियों से हार गए थे।

एक शख़्स वीबो पर लिखा, “आप दोनों लोग क्या नींद में थे? आपने थोड़ी-सी भी कोशिश नहीं की। क्या बकवास है!”

ऐसी प्रतिक्रिया इसलिए आ रही है क्योंकि हाल के वर्षों में ताइवान और चीन के रिश्तों में कड़वाहट बढ़ गई है।

 

गोल्ड मेडल जीतने वाले खिलाड़ी भी ट्रोलिंग का शिकार

चीन के इन लोगों को कई गोल्ड जितने वाले खिलाड़ियों को निशाना बनाया जिनमें से एक शार्पशूटर यांग कियान हैं। ये तब हुआ जब उन्होंने तोक्यो ओलंपिक में अपना पहला गोल्ड मेडल जीता।

उनकी इस जीत के बाद लोग उनकी एक पुरानी पोस्ट को लेकर उनपर बरस पड़े जिसमें कियान अपनी नाइकी के जूतों की कलेक्शन दिखा रही हैं।

 

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इन दिनों चीन के लोग नाइकी से खफ़ा हैं क्योंकि शिनजियांग प्रान्त में कथित तौर पर वीगर मुसलमानों से जबरन मज़दूरी कराए जाने की ख़बर के बाद ब्रांड ने यहाँ के कपास का इस्तेमाल बंद कर दिया।

इस बात से नाराज़ एक शख़्स ने कियान को लिखा, “एक चीनी खिलाड़ी के तौर पर आपने ये नाइकी के जूते क्यों जुटा रखे हैं? आपको तो नाइकी का बहिष्कार करने वालों की अगुआई करनी चाहिए?”

इस ट्रोलिंग के बाद कियान ने अपनी पुरानी पोस्ट हटा दी थी।
कियान जैसे अनेक गोल्ड मेडलिस्ट खिलाड़ियों को भी खरी-खोटी सुनाई जा रही है।

 

लिटिल पिंक्स की कहानी

खिलाड़ियों की जीत पर भी जिस तरह चीनी लोग नाराज़ हो रहे हैं वह अनोखा है। लोवा स्टेट यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ेसर डॉक्टर जोनाथन इसके पीछे काफ़ी हद तक ‘लिटिल पिंक्स’ को ज़िम्मेदार मानते हैं।

चीन के लिटिल पिंक्स उन युवाओं को बोलते हैं जो बेहद आक्रामक होकर सोशल मीडिया पर राष्ट्रवादी बातें बोलते या लिखते हैं।

दरअसल पिछले कुछ वर्षों में चीन के लोगों में राष्ट्रवाद चरम पर पहुँच गई है क्योंकि वैश्विक स्तर पर चीन की धाक मज़बूत हुई है और पश्चिमी देशों पर ये आरोप भी लग रहा है कि वे चीन के विकास में बाधा बन रहे हैं।

इस साल जुलाई महीने में जब चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे हुए तब राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि कोई भी विदेशी ताक़त चीन तो परेशान नहीं कर सकती।

 

कैसे उपजी ये “राष्ट्रवादी” भावना?

डॉक्टर श्नाइडर के हवाले से बीबीसी ने लिखा है, “अधिकारियों ने लोगों को समसामयिक मुद्दों को राष्ट्रवाद और देशभक्ति के नज़रिए से देखने की आदत डलवाई है। चीनी जनता को बताया गया है कि देश की सफलता सबसे ज़्यादा मायने रखती है इसलिए खिलाड़ियों को टोक्यो में सफल होना ही पड़ेगा।”

हालांकि डॉक्टर श्नाइडर इस बात को भी स्वीकार हैं कि चीन की सम्पूर्ण आबादी इस अति राष्ट्रवाद की ज़द में नहीं है। खिलाड़ियों की ट्रोलिंग के दौरान एक तबका ऐसा भी यह जो उन्हें समर्थन दे रहा था और उन्हें भला-बुरा कहने को ग़लत बता रहा था।

 

Credit- REUTERS

 

इसके बावजूद विशेषज्ञों को इस बात का डर है कि यह दौर एओ ख़तरनाक़ समय है जिसमें राष्ट्रवाद की भावना लोगों पर हावी हो रही है।
डॉक्टर जोनाथन कहते हैं, “कम्युनिस्ट पार्टी अपने फ़ायदे के लिए इंटरनेट पर राष्ट्रवाद को भुनाने की कोशिश करती है, लेकिन मौजूदा स्थिति दिखाती है कि जब चीनियों पर यह भावना हावी हो जाती है तो सरकार के लिए भी उन पर काबू पाना मुश्किल हो सकता है।”

वो कहते हैं, “राष्ट्रवादी भावनाओं को भुनाना बाघ की सवारी करने जैसा है। एक बार आप इस पर सवार हो गए तो फिर उतरना बहुत मुश्किल होता है।”

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