April 11, 2021

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बांग्लादेश की आज़ादी को 50 साल पूरे, लोकतंत्र और स्वतंत्रता पर एक नज़र

बांग्लादेश अपनी आज़ादी के 50 साल पूरे कर चुका है। इस जश्न के पीछे उसके इतिहास की गहरी जड़े हैं। देश का विकास तो हुआ है पर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा से जुड़े हालात गंभीर नज़र आते हैं। कई आलोचकों का कहना है कि बांग्लादेश में केवल एक ही पर्टी के रह जाने का ख़तरा नज़र आ रहा है, जिसमें विरोध का स्वर खो सकता है।
आलोचकों के मुताबिक़ बांग्लादेश का अस्तित्व जिन लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था वह अब धूमिल होता दिख रहा है। पूरे देश में विरोध की आवाज़ दबाई जा रही है। सरकार के ख़िलाफ़ बोलने वाले सभी लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। दरअसल यह प्रवृत्ति ‘द डिजिटल सिक्योरिटी एक्ट’ के तहत अब ज़्यादा ख़तरनाक हो गयी है।

क्या है डिजिटल सिक्योरिटी एक्ट का प्रभाव?

बांग्लादेश में सिविल सोसायटी कार्यकर्ताओं और सम्पादकों के व्यापक विरोध के बावजूद, अक्तूबर 2018 में द डिज़िटल सिक्योरिटी एक्ट (डी.एस.ए) क़ानून लागू किया गया था।
इस क़ानून के तहत गिरफ़्तार हुए कार्टूनिस्ट अहमद कबीर किशोर पिछले महीने जब अदालत में पेश किए गए तो उनकी दशा देखकर उनके भाई एहसान हैरान रह गए।
दरअसल किशोर ने कथित रूप से फ़ेसबुक पर महामारी से जुड़ी सरकार की नीतियों की आलोचना करते हुए कई कार्टून पोस्ट किए थे। इसके बाद मई महीने में अचानक कुछ लोग उन्हें उनके घर से बलपूर्वक उठा ले गए थे। इस बात का पता उनके परिवार को कई दिनों तक नहीं चला। इसके बाद उनके देश विरोधी गतिविधियों में शमिल होने को अफ़वाह उड़ी जिसके तहत उनकी गिरफ़्तारी की ख़बर आयी।
कार्टूनिस्ट अहमद कबीर किशोर
कार्टूनिस्ट अहमद कबीर किशोर
किशोर ने अपने भाई को बताया कि उन्हें जेल में प्रताड़ित किया गया है जिससे उन्हें कई जगह गंभीर चोटें आयी हैं। एहसान ने समाचार एजेंसी बीबीसी को बताया- “मेरे भाई के बायें कान पर चोट है और वो ठीक से चल फिर नहीं पा रहा। डॉक्टरों ने उनके दायें कान का ऑपरेशन कराने को भी बोला है।”
45 वर्षीय किशोर की ज़मानत याचिका छः बार खारिज की गई और अंततः जब उन्हें रिहा किया गया तब तक वे 10 महीने जेल में गुज़ार चुके थे।
बता दें कि उन्हें उठाकर ले जाने वाले लोगों की पहचान अभी तक नहीं हो पाई है जिसके चलते उनका ढाका के पुलिस स्टेशन तक पहुँचना रहस्य ही बना हुआ है।

ख़ुशक़िस्मत रहे किशोर

किशोर घर लौटने के मामले में ख़ुशक़िस्मत रहे क्योंकि इसी मामले में गिरफ़्तार हुए लेखक मुश्ताक़ अहमद की किशोर की ज़मानत से एक सप्ताह पहले जेल में ही मौत हो गयी थी।
इस मौत के बाद देशभर में प्रदर्शन हुए और सरकार की ख़ूब आलोचना हुई।
मुश्ताक़ अहमद
मानवाधिकार मामलों में संयुक्त राष्ट्र हाई-कमिश्नर कार्यालय के सदस्य रॉरी मुंगोवेन ने कहा कि “डिज़िटल सिक्योरिटी एक्ट के इस्तेमाल का बांग्लादेश की प्रेस और नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता पर बहुत असर पड़ा है।”
उन्होंने आगे कहा कि- “कोविड-19 महामारी के दौरान इसके नए आयाम देखने को मिले। इस महामारी से निपटने में नाकामी को लेकर सरकारी व्यवस्थाओं की ऑनलाइन आलोचना करने वाले कई लोगों को इस क़ानून के तहत गिरफ़्तार किया गया।”
बता दें सरकार इसपर अपनी सफ़ाई देते हुए इस क़ानून के लोगों के हित से जुड़े होने की बात कर रही है। हालाँकि इसके  दुरुपयोग को लेकर जाँच चल रही है और सरकार ने आश्वासन दिया है कि तबतक कोई गिरफ़्तारी नहीं होगी।

सरकार, जनता और विपक्ष

शेख़ हसीना को बांग्लादेश की अस्थिर राजनीति में स्थिरता लाने और आर्थिक विकास पर ज़ोर देने का श्रेय ज़रूर जाता है। विशेषकर छोटे कारखानों के उद्योग में तेज़ी से विकास हुआ है और देश की अर्थव्यवस्था में भी ख़ासा फ़र्क़ देखा जा रहा है।
हालाँकि लोकतंत्र का ढाँचा बांग्लादेश में कमज़ोर होता नज़र आ रहा है। सत्तारुढ़ अवामी पार्टी के नेतृत्व में देश में ढेरों आलोचक, आर्टिस्ट और पत्रकार सरकार की आलोचना करने के चलते या तो गिरफ़्तार हुए हैं या फिर ग़ायब हो गए हैं जिनका किसी को कोई पता नहीं है।
आम जन के अधिकारियों के लिए काम करने वाली ढाका स्थित संस्था ‘ओधिकार’ के अनुसार, साल 2009 के बाद से ग़ायब लोगों की संख्या के संबंध में 587 मामले दर्ज किए गए हैं। बता दें कि इनमें से 81 लोगों के शव बरामद हुए हैं और 149 लोग अब भी लापता हैं।
आज जब बांग्लादेश अपनी आज़ादी के 50 वर्षों तक का पड़ाव पार कर चुका है तब आलोचकों का मानना है कि कोई राजनीतिक स्पेस बाक़ी नहीं रह गया है। विपक्ष भी धीरे-धीरे ख़त्म होता नज़र आ रहा है।
विपक्षी नेता कमल हुसैन कहते हैं- “देश की मौजूदा स्थिति जैसी स्थिति शेख मुजीबुर्रहमान नहीं चाहते थे। देश की राजनीति में विपक्ष की जगह को बनाने के लिए कई पॉजिटिव क़दम उठाने की ज़रूरत है.”
बता दें कि बांग्लादेश 1971 में पाकिस्तान से इतर हिंदुस्तान की सहायता से अस्तित्व में आया था।
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