September 25, 2021

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‘बंगला’ नहीं बचा पाए चिराग, डेढ़ घण्टे इंतज़ार के बाद भी नहीं हो पाई चाचा से मुलाकात

रामविलास पासवान की पार्टी लोजपा में विवाद जारी है। सोमवार को पशुपति पारस ने मीडिया से बात कर पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी।

रामविलास पासवान के पुत्र और लोजपा अध्यक्ष चिराग पासवान पशुपति पारस के घर पहुंचे लेकिन उनकी मुलाकात पशुपति पारस से नहीं हो पायी। एक घंटे तक इंतजार करने के बाद भी उनकी मुलाकात नहीं हो पायी। इधर पशुपति कुमार पारस को सर्वसम्मति से लोकसभा में लोक जनशक्ति पार्टी (LJP) संसदीय दल का नेता चुन लिया गया है।

पिता ने रखी पार्टी की नींव

बिहार की सियासत में रामविलास पासवान की अहम भूमिका रही और उनकी रणनीति को विरोधी भी सबसे बेहतर मानते थे। उन्होंने अपने बेटे चिराग पासवान को सियासी ज़मीन तो दी, पार्टी में ऊंचा कद और पद भी दिया। उस बंगले ( लोक जनशक्ति पार्टी का चुनाव चिन्ह ) को सौंप दिया जिसे रामविलास पासवान ने मेहनत से बनाया था, उम्मीद रही होगी चिराग उसमें उजाला कर देंगे, लेकिन रामविलास पासवान के निधन के बाद चिराग पासवान पार्टी को संभल नहीं पाएं।

खुद के सांसदों ने छोड़ा साथ

अकेले चुनाव लड़ने का फैसला महंगा पड़ा। NDA तो जीत गई लेकिन अलग लड़कर चिराग सिर्फ एक उमीदवार को जीता पाए, वो भी जल्द पार्टी को अलविदा कर चले गए। 6 सांसद वाली पार्टी बिहार में शून्य विधायकों वाली पार्टी बन गयी। चिराग बताते रहे कि वो रणनीतिक रूप से सफल रहे हैं, लेकिन दरअसल ऐसा था नहीं एक तरफ बीजेपी नीतीश के साथ खड़ी रही और चिराग नीतीश विरोध में खड़े थे।

विधानसभा चुनाव की बात करें तो चिराग पासवान ने सबसे ज़्यादा उमीदवार जनता दल यूनाइटेड के ख़िलाफ़ उतारा था, लेकिन बीजेपी के ख़िलाफ़ बहुत कम उम्मीदवार थे। वो खुलकर नीतीश कुमार के विकास को झूठा बता रहे थे। खुद को बीजेपी के साथ बताने में जुटे रहे। चुनाव नतीजों में जनता दल यूनाइटेड को नुकसान हुआ और जेडीयू नेता भी मानते हैं अगर चिराग का विरोध नहीं होता तो वो ज़्यादा सीटें मिलती। चिराग पासवान मिशन नीतीश हटाओ में पूरी तरह विफल हो गए। नीतीश कुमार फिर मुख्यमंत्री बन गए।

पशुपति पारस भाई ही नहीं सलाहकार थे

पार्टी को एकजुट रखना चिराग पासवान के लिए मुश्किल होने लगा। पशुपति पारस रामविलास पासवान के भाई ही नहीं सबसे बड़े सलाहकार भी रहे हैं। चिराग की पार्टी में वो खुद को अलग थलग महसूस करने लगे। लेकिन वो चिराग से ज़्यादा पार्टी नेताओं के करीबी रहे हैं। नीतीश का कभी उन्होंने विरोध भी नहीं किया। जिस तरह की हार लोक जनशक्ति पार्टी को मिली उससे सांसदों को भी ये अंदेशा होने लगा था कि क्या इस तरह अकेले रहकर हम अगले चुनाव में जीत पाएंगे। पार्टी और परिवार में बिखराव साफ़ नज़र आने लगा। चिराग उस बिखराव को कम करने में नाकाम रहे और आख़िरकार रामविलास पासवान की बनाई पार्टी में उनके पुत्र चिराग अकेले रह गए।

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