October 24, 2021

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न्यायालय की अवमानना का अधिकार विधायी अधिनियम से भी छीना नहीं जा सकता – सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कहा कि न्यायालय की अवमानना ​​की शक्ति एक विधायी अधिनियम द्वारा भी नहीं छीनी जा सकती।

 

 

जस्टिस संजय किशन कौल और न्यायमूर्ति एमएम सुंदरेश की बेंच ने एक एनजीओ के अध्यक्ष को शीर्ष अदालत को ‘बदनाम करने और धमकाने’ के लिए 25 लाख रुपये जमा नहीं करने के लिए अवमानना ​​का दोषी ठहराया।

पीठ ने कहा कि एनजीओ सूरज इंडिया ट्रस्ट के अध्यक्ष राजीव दहिया अदालत, प्रशासनिक कर्मचारियों और राज्य सरकार सहित – उनपर “कीचड़ फेंक” रहे हैं। बेंच ने कहा कि दहिया स्पष्ट रूप से अदालत की अवमानना ​​के दोषी हैं और अदालत को बदनाम करने की उनकी कार्रवाई को वह मंज़ूरी नहीं दी जा सकती।

शीर्ष अदालत ने कहा, “अवमानना ​​के लिए दंडित करने की शक्ति इस अदालत के पास निहित एक संवैधानिक शक्ति है जिसे एक विधायी अधिनियम द्वारा भी छीना नहीं जा सकता है।”

शीर्ष अदालत ने दहिया को नोटिस जारी कर सज़ा पर सुनवाई के लिए सात अक्टूबर को उपस्थित होने का निर्देश दिया है। दहिया से धन की वसूली के संबंध में न्यायालय ने कहा कि यह भू-राजस्व के बकाया के रूप में किया जा सकता है।

दहिया ने बेंच द्वारा लगाए गए ख़र्च का भुगतान करने में असमर्थता के बारे में भी बताया था। उन्होंने कहा था कि वह दया याचिका के साथ राष्ट्रपति से गुहार लगाएंगे।

शीर्ष अदालत का आदेश दहिया के 2017 के फ़ैसले को वापस लेने के आवेदन पर आया है, जिसमें बिना किसी सफ़लता के 64 PILS दाखिल करने के लिए उन पर 25 लाख रुपये की लागत लगाई गई थी।

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