June 18, 2021

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उत्तरप्रदेश की राजनीति में मायावती कितनी सक्रिय?

बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती इन दिनों चर्चा से बाहर नज़र आ रही हैं। सोशल मीडिया पर उनको लेकर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले अभिनेता रणदीप हुड्डा अब लोगों के ग़ुस्से का सामना कर रहे हैं।

यह वीडियो नौ साल पुराना है, लेकिन इसके चर्चा में आने के बाद संयुक्त राष्ट्र की एक संस्था ने उन्हें एम्बेसडर की ज़िम्मेदारी से बाहर कर दिया है।

मुद्दे और मायावती

वैसे पिछले कई महीनों से मायावती राजनीतिक गलियारों से ग़ायब ही दिख रही हैं। कोरोना महामारी के दौरान योगी सरकार पर लचर स्वास्थ्य व्यवस्था के चलते कई आरोप लगते रहे, गंगा किनारे दफ़नाए गए शवों पर से कपड़े हटाने वाले प्रकरण पर भी सरकार की ख़ूब अलोचना हुई लेकिन वहाँ भी मायावती नज़र नहीं आईं। उनकी प्रतिक्रिया सोशल मीडिया पर औपचारिक बयानबाज़ी तक ही महदूद रही।

कांग्रेस और समाजवादी पार्टी दोनों ने ही सरकार को आड़े हाथों लिया लेकिन मायावती केवल महामारी से बचने के तरीक़े और कारणों पर ही बात करती दिखीं।

मायावती के इस रवैये पर राजनीतिक पत्रकार रामदत्त त्रिपाठी बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, “मायावती को मालूम है की सरकार प्रतिशोध की भावना से काम करती है तो इसलिए वो सरकार से किसी भी मुद्दे पर सीधे मुक़ाबले से बचती हैं। जनता को मोबिलाइज़ इन्हें सिर्फ़ इलेक्शन के लिए करना आता है। और बसपा की राजनीति सिर्फ़ उनके वोट बैंक तक सीमित है।”

 

रामदत्त त्रिपाठी यूपी के अन्य विपक्षी दलों से तुलना करते हुए कहते हैं, “काँग्रेस मुद्दे उठा रही है लेकिन उसकी ग्राउंड प्रजेंस नहीं हैं। ट्विटर हमलों की बात करें तो अखिलेश और काँग्रेस काफ़ी सक्रिय थे। लेकिन मायावती शायद यह सोचती हैं कि मेरा वोट बैंक मेरे साथ है।”

इन सबके बीच योगी सरकार आलोचना भी ख़ूब हुई हालाँकि मुख्यमंत्री ने कोरोना से बुरी तरह प्रभावित इलाक़ों का दौरा किया और इंतज़ामों का जायज़ा भी लिया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश के आगामी चुनाव में बीजेपी की स्थिति पर एक हाइप्रोफ़ाइल बैठक भी की जिसमें मुख्यमंत्री शामिल नहीं थे। ऐसे में आने वाले दिनों में उत्तरप्रदेश की राजनीतिक उथलपुथल बेहद अहम होने वाली है।

कोरोना संक्रमण से स्थिति गंभीर होने ठीक पहले किसान आंदोलन देश में एक बड़ा मुद्दा था जिसे लेकर कांग्रेस के साथ ही साथ अन्य राजनीतिक पार्टियां भी सक्रिय नज़र आईं लेकिन बावजूद इसके बहुजन समाज पार्टी ने इस मामले में न के बराबर हिस्सा लिया। यह हालत तब है जब उत्तरप्रदेश में अगले साल चुनाव होने वाले हैं।

14 अप्रैल को भीमराव अंबेडकर जयंती के दिन राज्य में कोरोना के बिगड़े हालातों के बीच मायावती किसी भी कार्यक्रम में शरीक नहीं हुईं और न ही पार्टी ने कोई बड़ा आयोजन किया। अपने घर से मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में मायावती ने कहा कि देशभर में कोरोना संक्रमण के चलते हालात ख़राब हैं और इसीलिए वे इस दिन को सादगी से ही मनाएंगी।

 

क्या कहता है आगरे का मन?

दरअसल अगले साल के चुनावों में मायावती और उनकी पार्टी की क्या भूमिका होगी, पार्टी कितनी सीटें हासिल कर पायेगी, इसे लेकर राजनीतिक हलकों में अटकलों का सिलसिला शुरू हो गया है। हालाँकि बहुजन समाज पार्टी की ज़मीनी हक़ीक़त अगरा से बेहतर कौन बता सकता।

मोहब्बत की निशानी आगरा को देश का दलित राजधानी भी कहते हैं क्योंकि यहाँ उत्तर प्रदेश में दलितों की जनसंख्या में जाटव यानी चमड़ा व्यवसाय से जुड़े लोगों का बाहुल्य है।

‘आगरा को देश भर में जूतों के मैन्युफ़ैक्चरिंग का गढ़ माना जाता है। छह लाख से ज़्यादा जाटव वोटर आगरा लोकसभा की सात विधानसभा सीटों में हार-जीत का फ़ैसला करने का माद्दा रखते हैं। 2007 में जब मायावती की पूर्ण बहुमत की सरकार चुन कर आयी तो आगरा की सातों सीटें बसपा ने जीती थीं।’

लेकिन अब 2007 की इस सक्सेस स्टोरी के हिट होने की संभावना कम ही मानी जा रही है। 2007 से 2017 के राजनीतिक सफ़र में बसपा आगरा की इन सात सीटों पर सात से शून्य पर आ गयी। 2007 में 206 विधान सभा सीटों की ऊंचाई से बसपा दस साल में 2017 में 19 सीटों तक गिर गई। इस बदलाव से यह तो स्पष्ट हो रहा है कि आगरे का मायावती की पार्टी के लिए जनाधार खिसकता ही नज़र आ रहा है।

 

Credit- Holidify

 

सात महीने पहले ही आगरा के जाटव बाहुल्य जगदीशपुर इलाक़े में बसपा से इस्तीफ़ा दे चुके रामवीर सिंह कर्दम ने विरोध प्रदर्शन करते हुए मायावती का पुतला फूंका। स्तीफ़े के बाद कर्दम ने जाटव महापंचायत (आगरा) का गठन किया।

कर्दम बसपा पर आरोप लगाते हैं, “बसपा में रहना है तो सबसे पहले पार्टी का टारगेट है पैसा इकट्ठा करना। अगर आप पैसा इकठ्ठा नहीं करवा पाते हैं और पार्टी में पैसा नहीं दिला पाते हैं, तो आप पद पर नहीं रह सकते हैं। आज जिन लोगों ने, जिस समाज के लोगों ने पार्टी को खड़ा किया, जाटव समाज का आदमी, वो भी टिकट मांगता है तो उससे पैसा लिया जाता है।”

वैसे पैसे लेकर टिकर बाँटने का आरोप मायावती की पार्टी पर पहले भी लगता रहा है और अब कई अन्य पार्टियों ने इसका अनुसरण भी किया है लेकिन अबतक किसी भी पार्टी पर इन आरोपों की पुष्टि नहीं हुई है।

बिखरकर क्या सम्हल सकी है पार्टी?

2007 से सत्ता पर क़ाबिज़ होने के बाद से ही विपक्षी पार्टियों ने मायावती पर दलित की बेटी से दौलत की बेटी होने का आरोप लगाया है। इन आरोपों के बीच मायावती की पार्टी और छवि को मैनेज करने वाले कई लोग थे जिन्होंने बेहद मेहनत से पार्टी को सम्हाल रखा था। लेकिन 2017 के ख़राब चुनावी नतीजों के बाद पार्टी बिखरने लगी।

कई नेता जैसे- स्वामी प्रसाद मौर्य, बृजेश पाठक और नसीमुद्दीन सिद्दीकी, या तो पार्टी से निकाल दिए गए या फिर ख़ुद ही पार्टी छोड़ कर चले गए। इनमें से कुछ लोग पार्टी के बहुजन मूवमेंट से जुड़े हुए थे और उन्होंने पार्टी को सत्ता में आने का सामर्थ्य देने के लिए कड़ी मेहनत की थी।

 

Credit- Hindustan Times

 

इसी तरह कई ऐसे नेता जिन्होंने बहुजन समाज पार्टी की आधारभूमि को संवारने में अपना योगदान दिया था, किसी न किसी कारण के चकते पार्टी से अलग हो गए। ऐसे नेता जो इस दल की छवि और भविष्य को लेकर आशंकित थे उन्होंने अपने लिए चंद्रशेखर आज़ाद की आज़ाद समाज पार्टी के साथ मिलकर अपनी राजनीतिक ज़मीन तैयार कर रहे हैं।

21 साल की उम्र से मायावती के साथ जुड़े रहे सुनील चित्तौड़ जोकि अब आज़ाद के खेमे में शामिल हैं, ने कहा, “चंद्रशेखर जी दबे कुचलों का साथ दे रहे हैं। समाज के लोगों का साथ दे रहे हैं. बहनजी खुद फील्ड में नहीं हैं। मिशन और मूवमेंट से हट गयी हैं।”

पार्टी से उठते बग़ावत के सुर

अब चंद्रशेखर आज़ाद की राजनीतिक सक्रीयता के चलते जहाँ एक ओर वे लोगों से जुड़ते जा रहे हैं वहीं दूसरी ओर मायावती की निष्क्रियता से उनकी पार्टी पर बेहद बुरा असर पड़ रहा है। पार्टी में अब वह सब हो रहा है जिसकी उसने पहले कभी कल्पना नहीं की होगी, पार्टी के भीतर अब बग़ावती सुर उभरने लगे हैं।

हाकिम लाल बिंद जोकि एक बसपा विधायक हैं जिन्हें पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल होने के कारण छः सदस्यों संग निलंबित किया गया है, ने बताया, “हमने पहले भी यह कहा था कि माननीय बहन जी सामंतवादी ताक़तों से मिल कर, कैंडिडेट लड़ा रही थीं। और सामंतवादी ताक़तों से हम लोगों की विचारधारा नहीं मिलती थी, क्योंकि हमको ग़रीबों ने वोट किया था, हमको शोषित और पिछड़ा समाज ने वोट किया था। हमको अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों ने वोट दिया था। इसलिए हम लोगों ने बग़ावत किया था।”

 

Credit- Deccan Herald

 

बग़ावत की कई और कहानियां बसपा के गलियारों में सुनाई देती रही हैं। कइयों पर विपक्षी पार्टी के नेता अखिलेश यादव से मिलने का भी आरोप लगता रहा है।
बिंद इसपर कहते हैं, “हमने समाजवादी पार्टी की कोई सदस्यता नहीं ली हैं। हम लोग बहुजन समाज पार्टी के ही विधायक हैं। और 2022 तक बहुजन समाज पार्टी के विधायक बने रहेंगे। और आगे माननीय बहन जी जो निर्णय लेंगी, उनका निर्णय हम लोगों के लिए सर्वमान्य है। माननीय बहन जी ने हम लोगों को पार्टी से निलंबित किया है और निलंबन अस्थायी रूप से होता है। निष्कासन नहीं होता है। शायद वो हम लोगों को वापस लेंगी।”

 

मुसलमानों पर कितना असर?

2014 लोकसभा चुनावों में शून्य पर सिमटी बसपा ने 2019 के चुनावों में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर मैदान में उतरी और 10 लोकसभा सांसदों तक पहुँची लेकिन इसके बाद वोट ट्रांसफ़र न होने की वजह बताकर वह गठबंधन से अलग हो गईं। इसी फ़ैसले से मुसलमानों का भरोसा मायावती से डिगा। इस क़दम को मुसलमानों के लिए पहला सियासी सदमा भी बताया जाता है जिसके बाद से मुसलमानों को मायावती पर संदेह करने की जायज़ वजह मिल गयी।

जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद-370 हटाने का मायावती ने खुल कर समर्थन किया और संसद में सरकार के समर्थन में वोट भी दिया। यहाँ तक कि अनुच्छेद-370 के ख़िलाफ़ बोलने के कारण अमरोहा के सांसद दानिश अली को सज़ा भी मिली और उन्हें लोकसभा में पार्टी के नेता पद से हटा दिया गया। मायावती ने दबाव के चलते बाद में टिप्पणी तो दी पर बेहद दबी ज़बान से।

इसके बावजूद पार्टी में टिके रहे बसपा सांसद दानिश अली ने बसपा के भविष्य के बारे में सवाल करने पर उसका इतिहास दोहराया, “आप किसी से भी पूछ लीजिए, की राज्य की पिछली तीन सरकारों में क़ानून व्यवस्था सबसे अच्छी किसकी रही है तो आज भी लोग बहन जी के शासनकाल को सबसे बेहतर बताते हैं। पार्टी का मूवमेंट से जुड़ा वोटर अब भी कायम है और वो बहन जी के इशारे पर वोट देते हैं। इसे तोड़ने की कोशिशें जारी हैं लेकिन वो अब तक नाकाम रही हैं और आगे भी नाकाम रहेगी।”

 

Credit- The Indian Express

 

कई इलाक़ों में बहुत से लोगों का ये भी मानना है कि पहले उन्होंने बसपा को एकतरफ़ा वोट दिया है और अब वे समाजवादी पार्टी को आज़माना चाहते हैं।

विशाल रियाज़ आगरा की एक नाट्य अकादमी से जुड़े हुए हैं. उनका मानना है कि मुसलमान समुदाय का बसपा से भरोसा कम हुआ है. वे कहते हैं, “ये सच है कि मुसलमान बहन जी से जो उम्मीद रखता था, वो चीज़ बहनजी से मुसलमानों को नहीं मिली। बहनजी के कुछ वक्तव्य ऐसे रहे हैं जो बीजेपी को मज़बूत करने वाले रहे हैं। इससे मुस्लिम समाज में शंका पैदा हुई कि वे भाजपा के साथ हैं और भाजपा की हिमायती हैं। यह बिल्कुल सच है, ऐसा बिल्कुल महसूस किया है पब्लिक ने। और जब कोई बात ऐसी आती है, जैसे अनुच्छेद-370 हो, या सीएए की हम बात करते हैं, उस पर उन्होंने खुल कर बात नहीं की, दबी ज़ुबान से बात की।”

मायावती पर एक आरोप ये भी लगता है कि उन्हें अपने ऊपर घोटालों के लिए कार्यवाई होने का डर है जिसके चलते वे खुलकर केंद्र की नीतियों पर सवाल नहीं उठतीं। हालांकि उनके समर्थकों का कहना है कि उन्हें खुलकर कुछ बोलने या फ़ील्ड पर उतरने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि उनके वोटर उन्हें ऐसे ही वोट देंगे।

आम आदमी पार्टी की यूपी में एंट्री

मायावती के सामने एक बड़ी चुनौती अरविंद केजरीवाल भी हैं जिनकी पार्टी ने उत्तरप्रदेश की राजनीति में एंट्री ले ली है। केजरीवाल का ‘दिल्ली मॉडल’ लोगों के सामने एक उदाहरण की तरह पेश किया जा रहा है और लोग उसपर भरोसा भी करते दिख रहे हैं।

 

Credit- Amar Ujala

 

आगरा के जगदीशपुर इलाके में 30 साल के जाटव विजय सोनी लॉकडाउन से पहले दिल्ली के मंदिपुर इलाके में जूते के कारखाने में काम कर रहे थे, उन्होंने कहा, “केजरीवाल ने लॉकडाउन में हर परिवार को पाँच-पाँच हज़ार रुपये दिए हैं। स्कूल सुधार दिए हैं। केजरीवाल नंबर-1 सीएम हैं।”

उन्होंने केजरीवाल को वोट देने के सवाल पर कहा कि उम्मीद की जा सकती हैं क्योंकि वे यूपी में आ तो गए हैं।

अब सवाल ये उठता है कि क्या मायावती को उत्तप्रदेश में बसपा की धुंधलाती तस्वीर दिखाई नहीं दे रही है? क्या वे इस बात से अनजान हैं कि प्रदेश की राजनीति में उनका हस्तक्षेप विरले ही मिल रहा है? क्या उन्हें नहीं मालूम कि जिन दलितों के भरोसे के आधार पर वे कभी सत्तासीन थीं अब उन्हें हिंदुत्व के पाले में खींचा जा रहा है जिन्होंने सदियों से उनका शोषण किया है? इन सवालों के जवाब तो मायावती ही दे सकती हैं लेकिन फ़िलहाल यह तो साफ़ है कि उत्तरप्रदेश के आगामी चुनाव में बसपा की 2019 वाली स्थिति में ज़्यादा परिवर्तन तो मुश्क़िल ही है।

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