October 26, 2021

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‘सभी को अपनी मर्ज़ी का जीवन साथी चुनने का अधिकार है, चाहे वो किसी भी धर्म का हो’ – इलाहाबाद हाईकोर्ट

उत्तर प्रदेश सहित कई राज्यों ने अंतर्धार्मिक विवाहों में जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए क़ानून बनाए हैं। अब इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा है कि वयस्कों को अपना जीवन साथी को चुनने का अधिकार है, चाहे उनका धर्म कुछ भी हो।

 

Livelaw

 

गोरखपुर के एक अंतर्धार्मिक जोड़े पर फ़ैसला सुनाते हुए हाई कोर्ट ने ये बात कही। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने कहा कि शादी की योजना बना रहे एक अंतरधार्मिक जोड़े के माता-पिता भी उनके रिश्ते और फ़ैसले पर आपत्ति नहीं कर सकते।

समाचार एजेंसी आईएएनएस की रिपोर्ट के अनुसार अदालत ने कहा, “ऐसे मामले में उनके माता-पिता भी उनके रिश्ते पर आपत्ति नहीं कर सकते।”

शिफ़ा हसन और उनके हिंदू साथी द्वारा संयुक्त रूप से दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस दीपक वर्मा की बेंच ने कहा, “इस बात पर कोई विवाद नहीं हो सकता कि दो वयस्कों को अपने वैवाहिक साथी की पसंद का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म के हों।”

गुरुवार को दिए गए इस फ़ैसले में अदालत ने कहा, “चूंकि वर्तमान याचिका दो व्यक्तियों की एक संयुक्त याचिका है जो दावा करते हैं कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं और वयस्क हैं, इसलिए हमारे विचार से कोई भी, यहां तक ​​कि उनके माता-पिता भी उनके रिश्ते पर आपत्ति नहीं कर सकते हैं।”

संयुक्त याचिका में याचिकाकर्ताओं की दलील थी कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं और अपनी मर्ज़ी से साथ रह रहे हैं। हालाँकि, उनके रिश्ते को उनके परिवार के कुछ सदस्यों द्वारा स्वीकार नहीं किया जा रहा था और वे उनके शांतिपूर्ण जीवन में खलल डाल रहे थे। सभी पक्षों को सुनने के बाद अदालत ने दंपति को यह कहते हुए संरक्षण प्रदान किया कि उनके माता-पिता भी उनके रिश्ते पर आपत्ति नहीं कर सकते।

अदालत ने पुलिस अधिकारियों को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि याचिकाकर्ताओं को लड़की के पिता या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा एक-दूसरे के साथ संबंधों के लिए किसी भी तरह का उत्पीड़न न सहना पड़े।

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता शिफ़ा हसन ने अदालत के समक्ष कहा कि उन्होंने मुस्लिम से हिंदू धर्म में धर्मांतरण के लिए एक आवेदन भी दायर किया है। उनके अनुसार उक्त आवेदन पर ज़िलाधिकारी ने संबंधित थाने से रिपोर्ट मांगी थी। रिपोर्ट के मुताबिक, लड़के के पिता शादी के लिए राज़ी नहीं थे, हालांकि उसकी मां इसके लिए तैयार थी।

हसन के माता-पिता दोनों शादी के ख़िलाफ़ थे। अदालत ने इस तथ्य पर ध्यान दिया कि दोनों याचिकाकर्ता बालिग हैं, जिनकी आयु क्रमशः 19 और 24 वर्ष है।

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