October 24, 2021

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आज के समय में कितनी है गांधी की प्रासंगिकता?

गांधी जीवन के मूल्यों से स्वराज्य का सेतु बनाने वाले वो शख़्स हैं जिनके मानवता पर विश्वास ने भारत ही नहीं दुनियाभर को एक नई राह की ओर मोड़ दिया। उनके ज़रिए स्वतंत्रता और संघर्ष की नई परिभाषा गढ़ी गई।

 

Reuters

 

गांधी ने जब स्वराज्य की कामना की तब चाहा कि भारतवर्ष के शासन लोक-सम्मति से हो। जनता की सरकार तक पहुँच हो, वह अधिकार से स्वंय की गिनती राज्य की उंगलियों पर रख सके। उन्होंने चाहा कि जनता अधिकार की लड़ाई के प्रति जागरूक हो, वह समझे कि कब सत्ता उसपर अपने अत्याचारी पंजे गड़ा रही है और एकजुट होकर वह उनके ख़िलाफ़ उठ खड़ी हो।

 

क्या हिंदुस्तान हिंदुओं का है?

गांधी साम्प्रदायिकता के कड़े विरोधी थे। उनकी वैचारिकता सम्प्रदायवादियों, धर्मान्धों और फंडामेंटलिस्टों की वैचारिकता के विरुद्ध है। वे पूरी निष्ठा से मानते थे कि धर्म एक निजी चुनाव है और इसका इस्तेमाल राजनीति में या लोगों को बाँटने में कतई नहीं किया जा सकता।

‘मेरे सपनों का भारत’ में गांधी लिखते हैं, “कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि भारतीय स्वराज्य तो ज़्यादा संख्या वाले समाज का यानी हिंदुओं का ही राज्य होगा। इस मान्यता से ज़्यादा बड़ी कोई दूसरी ग़लती नहीं हो सकती। अगर यह सही सिद्ध हो तो अपने लिए मैं ऐसा कह सकता हूं कि मैं उसे स्वराज्य मानने से इंकार कर दूंगा और अपनी सारी शक्ति लगाकर उसका विरोध करूंगा। मेरे लिए हिंद स्वराज्य का अर्थ सब लोगों का राज्य न्याय का राज्य है।”

 

AFP

 

गांधी का मानना था कि भारत में स्वराज्य जितना किसी राजा के लिए होगा उतना ही किसान के लिए भी होगा। वह जितना यहूदी, मुसलमानों, हिंदुओं के लिए होगा, उतना ही जैन, सिख, पारसियों और ईसाइयों के लिए भी होगा।

गांधी का हिन्दू थे लेकिन उनका धर्म ‘हिन्दुत्व’ से कहीं सरोकार नहीं रखता था। आरएसएस की दिशा को उन्होंने ‘हिन्दू धर्म के विरोध की दिशा’ कहा है और उसके बुरे परिणाम की आशंका भी उन्होंने ज़ाहिर की थी। गांधी का धर्म सत्य और अहिंसा पर आधारित है – ‘सत्य मेरा भगवान है, अहिंसा उसे पाने का साधन’। गांधी के लिए वो व्यक्ति ‘धार्मिक’ है ‘जो दूसरों का दर्द समझता है।’

 

गोरक्षा पर गांधी ने क्या कहा था?

गांधी गाय को भारत के आम जीवन का अभिन्न अंग मानते थे, उनका कहना था कि माँ से श्रेष्ठ गाय है जो निःस्वार्थ भाव से हमारे लिए अंत तक समर्पित रहती है।

 

उन्होंने गोरक्षा को ‘हिन्दू धर्म का प्रधान अंग’ माना लेकिन इसे केवल मुसलमानों से जोड़कर देखना उन्हें कभी सुभीता नहीं लगा। यंग इंडिया में गांधी ने अपने ख़याल उतारते हुए लिखा, ‘इस बारे में हम जो केवल मुसलमानों पर ही रोष करते हैं, यह बात किसी भी तरह मेरी समझ में नहीं आती। अंग्रेज़ों के लिए रोज कितनी ही गायें कटती हैं। परन्तु इस बारे में तो हम कभी जबान तक भी शायद ही हिलाते होंगे… गाय के नाम से जितने झगड़े हुए हैं। उनमें से प्रत्येक में निरा पागलपन भरा शक्ति क्षय हुआ है।’

 

लोकतंत्र, हिंसा और सत्ता का क्या मेल?

गांधी प्रजातंत्र की पैरोकारी करते थे। उन्होंने अन्याय के ख़िलाफ़ मुखरता को सच्चे लोकतंत्र की नींव माना। उनके मुताबिक़ हिंसा का कोई रास्ता कभी लोकतंत्र की ओर अग्रसर नहीं हो सकता। इस विषय पर गांधी लिखते हैं, ” लोकतंत्र और हिंसा का मेल नहीं बैठता। जो राज्य आज नाम मात्र के लिए लोकतंत्रात्मक हैं उन्हें या तो स्पष्ट रूप से तानाशाही का हामी हो जाना चाहिए या अगर उन्हें सचमुच लोकतंत्रात्मक बनना है पूरे साहस के साथ अहिंसक बन जाना चाहिए। यह कहना बिल्कुल अविचारपूर्ण है कि अहिंसा का पालन केवल व्यक्ति ही कर सकते हैं और राष्ट्र – जो व्यक्तियों से ही बनते हैं – हरगिज़ नहीं।”

यह बात उनके लिए बेहद ज़रूरी थी कि तंत्र में ऊँचे से ऊँचे और नीचे से नीचे आदमी को बढ़ने के समान अवसर मिलें। सत्ता मुट्ठीभर लोगों के पंजों में कसी, किसी लगाम सी न हो, उसे आम आदमी के बीच से उठकर समस्त देश का हो जाना चाहिए।

इस बात के पक्षधर गांधी ‘मेरे सपनों का भारत’ में लिखते हैं, “जब राजसत्ता जनता के हाथ में आ जाती है तब प्रजा की आज़ादी में होने वाले हस्तक्षेप की मात्रा कम से कम हो जाती है। दूसरे शब्दों में, जो राष्ट्र अपना काम राज्य के हस्तक्षेप के बिना ही शांतिपूर्वक और प्रभावपूर्ण ढंग से कर दिखाता है उसे ही सच्चे अर्थों में लोकतंत्रात्मक कहा जा सकता है। जहां ऐसी स्थिति न हो, वहां सरकार का बाहरी रूप लोकतंत्रात्मक भले हो, परंतु वह नाम की ही लोकतंत्रात्मक है। …सच्ची लोकशाही केंद्र में बैठे हुए (दस-बीस) आदमी नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलाई जानी चाहिए।”

 

BBC

 

ऐसे समय में जब गांधी के मूल्य किसी रेत की तरह भारत की मुट्ठी से रिस रहे हैं, ज़रूरत है उस शख़्स को याद करने की जिसने क्रांति की चिरस्थाई मानी जाने वाली मूल प्रवृत्ति को बदल कर रख दिया। बढ़ती नफ़रत और बँटवारे की राजनीति आज हिंदुस्तान के गले में पंजे का ज़ोर आज़मा रही है, ऐसे में गांधी ही हैं जो प्रेम और अहिंसा की अलख जलाए खड़े हैं।

हमें गांधी का यह कथन याद रखना चाहिए ‘चलिए सुबह का पहला काम ये करें कि इस दिन के लिए संकल्प करें कि मैं दुनिया में किसी से डरूंगा नहीं… मैं किसी अन्याय के समक्ष झुंकूंगा नहीं। सत्य असत्य से जीते… और असत्य का विरोध करते हुए मैं सभी कष्टों को सह सकूं।’

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