रूस-यूक्रेन संकट: भारत के रुख पर सभी की निगाहें, भारत का गुटनिरपेक्ष रहना आसान नहीं

by Disha
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रूस-यूक्रेन संकट के चलते देशों के सामने दोहरी चुनौती हैं, पहली ताकतवर रूस के सामने विस्तारवादी नीतियों का विरोध करना और दूसरी यूक्रेन की संप्रभुता की लडाई में साथ देना. अगर इन दोनों बातों में कोई भी देश एक के साथ भी जाता है तो सीधे सीधे नाटो देशों और यूक्रेन का समर्थक माना जाएगा. अभी तक यूक्रेन को केवल नाटो देशों का खुलकर साथ मिल रहा हैं लेकिन मिलिट्री ऑपरेशन या किसी भी प्रकार की सैन्य कार्रवाई का आश्वासन नहीं मिला है. नियम के मुताबिक अमेरिका या नाटो सेना को सदस्य देशों की सुरक्षा के लिए ही भेजा जा सकता है. यूक्रेन नाटो का सदस्य देश नहीं है ऐसे में अमेरिका द्वारा प्रत्यक्ष रुप से मदद करना संभव नहीं है.

Reuters

 

नेटो के किसी भी सदस्य देश पर हमला, सभी देशों पर हमला

अमेरिका के विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने व्हाइट हाउस में एबीसी चैनल से बातचीत के दौरान कहा कि नाटो की रक्षा की प्रतिबद्धता की बात कही. उन्होंने कहा रूस की योजना यूक्रेन पर हमला कर वहां की सरकार को अपदस्थ करने की हैं. रूस राजधानी कीफ़ को कब्जे में लेकर यूक्रेन की चारों तरफ से घेराबंदी करना चाहता है. गौरतलब हैं यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़ेलेंस्की ने एक वीडियो संदेश जारी कर कहा कि “वे (रूस) यूक्रेन के प्रमुख को ख़त्म कर राजनीतिक रूप से नष्ट करना चाहते हैं. दुश्मनों के निशाने पर सबसे पहले मैं हूँ और दूसरे नंबर पर मेरा परिवार है.”

एंटनी ब्लिंकन ने कहा कि अमेरिका के लिए नाटो देशों की सुरक्षा प्राथमिकता है जिसके लिए अमेरिका प्रतिबद्ध हैं. ब्लिंकन ने कहा कि नाटो के किसी भी देश पर हमला करना नाटो के सभी देश पर हमला है. साथ ही उन्होंने राष्ट्रपति के नाटो की रक्षा वाले बयान को भी दोहराया जिसमें बाइडेन ने कहा था कि “नेटो के हर इंच की सुरक्षा होगी. मुझे लगता है कि पुतिन ने हमले का दायरा यूक्रेन के बाहर किया तो हमारी यह प्रतिबद्धता काफ़ी है.”

भारत का संदेश: संकट के समय शांति की अपील

भारत ने अभी तक खुले रुप से किसी का समर्थन नहीं किया है. रूस, भारत का पहले से रक्षा उपकरणों का सहयोगी रहा हैं और अभी भी डिफेंस डील के कई उपकरणों की डिलीवरी अधर में फँसी है।

इसके अलावा रूस का चीन के साथ बढ़ता मार्केट शेयर और पाकिस्तान के साथ सॉफ्ट रिलेशनशिप ने रिश्तों में दूरियां जरूर पैदा की हैं लेकिन कई मौकों पर यूएन में भारत के पक्ष में वीटो का इस्तेमाल कर रूस ने अच्छे दोस्त की भूमिका भुलाई नहीं जा सकती.

वहीं अमेरिका से भारत के रिश्तों में डिफेंस डील और मार्केटिंग प्रतिस्पर्धा के चलते सहजता बढ़ी है. व्हाइट हाउस में एक प्रश्न की शक्ल में जो बाइडेन से पूछा गया अगर भारत और अमेरिका बड़े रक्षा साझीदार हैं तो दोनों देश क्या रूस के मामले में एक साथ हैं?
बाइडेन ने जवाब देते हुए कहा कि ”अमेरिका आज भारत से बात करेगा. अभी तक पूरी तरह से इसका कोई समाधान नहीं निकला है.”

अब भूराजनैतिक स्थिति पहले जैसी नहीं हैं कि जैसा कि पहले से भारत गुटनिरपेक्षता का समर्थक रहा हैं अब इस समय में भारत को अपनी बात रखनी होगी.
गौरतलब है भारत ने यूएन में निंदा प्रस्ताव पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भारत के यूएन में स्थाई प्रतिनिधि टीएस त्रिमूर्ति ने बिना रूस का नाम लिए संकट के समय शांति की बात कही है.

लेखक: गौरव मिश्र

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