December 2, 2021

MotherlandPost

Truth Always Wins!

‘लिव इन रिलेशनशिप को सामाजिक नैतिकता के बजाय पर्सनल लिबर्टी के लेंस से देखा जाना चाहिए’ – इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने कहा है कि “लिव-इन रिलेशनशिप जीवन का अभिन्न अंग बन गए हैं और इसे सामाजिक नैतिकता की धारणाओं के बजाय व्यक्तिगत स्वायत्तता(Personal liberty) के लेंस से देखे जाने की आवश्यकता है।”

 

Livelaw

 

इंटरफ़ेथ लिव-इन कपल्स द्वारा दायर दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए, जस्टिस प्रिंकर दिवाकर और जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव की खंडपीठ ने कहा, “लिव-इन रिलेशनशिप को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अप्रूव किया जाता है और इसे सामाजिक नैतिकता की धारणा के बजाय, संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत दर्ज जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर व्यक्तिगत स्वायत्तता के लेंस से देखा जाना चाहिए।”

दोनों जोड़ों ने अलग-अलग याचिकाएं दायर कर आरोप लगाया था कि लड़कियों के परिवार याचिकाकर्ताओं के दैनिक जीवन में हस्तक्षेप कर रहे हैं।

एक याचिका कुशीनगर निवासी शायरा खातून और उनके साथी (दोनों मेजर और दो साल से लिव-इन रिलेशनशिप में) द्वारा दायर की गई थी और दूसरी मेरठ की ज़ीनत परवीन और उनके साथी (दोनों मेजर) द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने पुलिस द्वारा मदद से इनकार करने के बाद हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

अदालत ने रेखांकित किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित जीवन के अधिकार की हर कीमत पर रक्षा की जानी चाहिए और कहा कि पुलिस याचिकाकर्ताओं के अधिकारों की रक्षा करने के लिए बाध्य है।

इसलिए, अदालत ने अपने आदेश में निर्देश दिया कि अगर याचिकाकर्ता जीवन और स्वतंत्रता के ख़तरे की शिक़ायत के साथ पुलिस के पास जाती है तो उसे क़ानून के तहत अपने कर्तव्यों का पालन करना होगा।

ग़ौरतलब है कि अदालत का ये आदेश दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा एक युवा वयस्क जोड़े को परेशान करने के लिए उत्तर प्रदेश पुलिस की खिंचाई करने के बाद आया है।

Translate »