April 11, 2021

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कौतूहल और स्थिरता का संतुलन है महादेवी वर्मा का साहित्य: जन्मदिन पर विशेष

“तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?”
कल्पना का अनन्त संसार लिए महादेवी वर्मा का साहित्य किसी सैर से कम नहीं। छायावादी युग के अग्रणी रचनाकारों में से एक महादेवी वर्मा ने साहित्य से जितना लिया है, उतना ही जोड़ा भी है। 26 मार्च 1907 उत्तर प्रदेश के फ़र्रुखाबाद में जन्मीं महादेवी का बाल विवाह हुआ था, लेकिन ताउम्र उन्होंने अविवाहित जीवन यापन किया। उनका निजी जीवन उनके साहित्य में बख़ूबी झलकता है।
साहित्य संगीत
महादेवी वर्मा छायावादी युग प्रवर्तकों सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और जयशंकर प्रसाद के साथ का चौथा स्तम्भ हैं। महादेवी प्रकृति प्रेमी हैं। उनका रचना संसार इस प्रेम की ज़मीन पर खड़ा होता है और उसी पर खिलता है। प्रकृति के अनंत प्रश्नों की ओर वे जिज्ञासु हैं, इस भावना को वे अप्रत्यक्ष रूप से रचना की सूरत देती हैं। इसी अप्रत्यक्षता को छायावाद का ‘रहस्यवाद’ कहा गया। उन्होंने अपनी जिज्ञासा में प्राकृतिक बिम्बों का सुंदर प्रयोग किया जो कई मायनों में मील का पत्थर साबित हुए। वे अपनी रचना के माध्यम से प्रकृति या उससे परे किसी सत्य की तलाश करते हुए कहती हैं-
“तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूँ उस ओर क्या है!
जा रहे जिस पंथ से युग कल्प उसका छोर क्या है?”
यह भी है कि इसी रहस्यवाद के चलते इनकी कविता की एक निश्चित परिपाटी पर समीक्षा करने वाले आलोचकों ने इनकी रचनाओं को खारिज करने की बात भी कही है। लेकिन यही छायावाद की प्रवृत्ति रही है जिसमें महादेवी पारंगत हैं। महादेवी वर्मा जितना प्रकृति की परतें खोलने को आतुर हैं उतना ही पेड़, पौधों, पक्षियों और जानवरों से भी। उनकी रचना “गिल्लू” इसका सुंदर उदाहरण है जिसने मनुष्य के प्रेम को असीमित बतलाने के लिए ऐसा भावनात्मक जाल बुना है कि पाठक उससे विस्मित हो उठता है। वह उनके दुःख में दुःखी होता है और सुख में पुलकित हो जाता है। अपने कविता संग्रह “मेरा परिवार” में उन्होंने पालतू पशुओं के संस्मरण लिखें हैं जिनसे उनकी पशुओं के प्रति आत्मीयता भी दिखाई देती है। पशु-पक्षियों के रोज़मर्रापन के अनन्त ख़्याल उनके मन में चलते हैं जिसकी एक झलक इन पंक्तियों में मिलती है।
“आँधी आई ज़ोर शोर से,
डालें टूटी हैं झकोर से।
उड़ा घोंसला अंडे फूटे,
किससे दुख की बात कहेगी!
अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी?”
महादेवी वर्मा केवल करुणा ही नहीं, करुण हुंकार का भी स्वर बुलंद करती हैं। वे मनोवैज्ञानिक रचना भी करती हैं और व्यक्ति के भीतर के कौतूहल को न केवल समझती हैं बल्कि उसे सटीक शब्द भी देती हैं।”नीहार के रचना काल में मेरी अनुभूतियों में वैसी ही कौतूहल मिश्रित वेदना उमड़ आती थी, जैसे बालक के मन में दूर दिखायी देने वाली अप्राप्य सुनहली उषा और स्पर्श से दूर सजल मेघ के प्रथम दर्शन से उत्पन्न हो जाती है।”
महादेवी वर्मा केवल समस्याओं को उजागर ही नहीं करतीं बल्कि जीवन की परिस्थितियों के समक्ष निर्भयता से खड़े रहने का संदेश वो अपने पाठकों तक पहुँचाती हैं। उनकी इन रचनाओं में मनुष्य के भीतर दृढ़ता से समस्याओं को चुनौती देने का भाव जगाने के लिए वे लिखती हैं-
“बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!”
‘दीप’ महादेवी वर्मा का प्रिय बिम्ब है जिसका प्रयोग न केवल उन्होंने कविताओं में किया बल्कि काव्य संग्रहों की भी रचना की। उनका रचना संसार इतना व्यापक है कि उसे चंद शब्दों में समझना या समझाना उनके साहित्य क्षितिज का माप करने जैसा होगा
स्त्री विमर्श और महादेवी वर्मा
महादेवी वर्मा की क़लम केवल प्रकृति के प्रश्नों और मनुष्य के मनोभावों तक ही समिति नहीं हैं। भारत में स्त्री विमर्श के आरंभिक दौर में जब उसका एक ठीक-ठाक ढाँचा भी तैयार न हो पाया था, जब उसके भारतीय स्वरूप के सामने स्वयं को स्थापित करने की चुनौती थी, तब महादेवी वर्मा ने इस विमर्श की ज़मीन तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। डॉ॰ हृदय नारायण उपाध्याय के शब्दों में, “आज स्त्री-विमर्श की चर्चा हर ओर सुनाई पड़ रही है। महादेवी ने इसके लिए पृष्ठभूमि बहुत पहले तैयार कर दी थी। सन्‌ 1942 में प्रकाशित उनकी कृति “श्रृंखला की कड़ियाँ” सही अर्थों में स्त्री-विमर्श की प्रस्तावना है जिसमें तत्कालीन सामाजिक परिस्थितियों में नारी की दशा, दिशा एवं संघर्षों पर महादेवी ने अपनी लेखनी चलायी है।”
महादेवी ने स्त्री जीवन की कठिनाइयों और संघर्षों को परंपराओं के अतीत में तलाशने और अपने जवाब हासिल का सुंदर प्रयास इस रचना के माध्यम से किया है। यह निबंधों का एक संकलन था जिसमें भारतीय स्त्री की दशा की जड़ों की पहचान का प्रयास लेखिका ने किया। ‘युद्ध और नारी’ नामक उनके एक लेख में उन्होंने स्त्री-पुरूष के मनोविज्ञान पर भी गंभीर मौलिक चिंतन किया है। इसी कड़ी में वे
‘नारीत्व और अभिशाप’ के माध्यम से पौराणिक प्रसंगों का उल्लेख करते हुए आधुनिक नारी के शक्तिहीन होने के कारणों की समीक्षा करती हैं।
प्रेम की राह
महादेवी वर्मा ने प्रेम की रचनाएँ भी की हैं। हालाँकि छायावादी प्रवृत्ति के चलते यह भावना रहस्यवाद का लबादा ओढ़े रहती हैं। वे प्रेम की तलाश में बिम्बों का सहारा लेती हैं, उसकी सूरत उकेरने का प्रयास करती हैं। कभी प्रेम प्रकृति का सा दिखता है तो कभी वह दिखता ही नहीं। वे असीमित प्रेम की पैरोकारी करती दिखाई देती हैं, इसीलिए अपने प्रेम को वे कण-कण में ढूंढ़ती हैं, उसे परिभाषित करने के लिए इच्छुक हैं।
अपने प्रेम को वे बादल में खोजती हैं, स्वप्नों में झाँकती हैं और अपनी आँखों के पानी में भी प्रेम की तलाश करती हैं।
“मूक सुख दुख कर रहे
मेरा नया श्रृंगार सा क्या?
झूम गर्वित स्वर्ग देता
नत धरा को प्यार सा क्या?”
महादेवी वर्मा हिंदी साहित्य के उन रचनाकारों में से एक हैं जिन्हें साहित्य से जुड़े लगभग सभी पुरस्कार मिलने का सम्मान प्राप्त है। सशक्त कवियत्रियों की श्रृंखला में आने के कारण उन्हें ‘आधुनिक मीरा’ के नाम से भी जाना जाता है। महाकवि ‘निराला’ ने उन्हें “हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती” कहा है। वे उन रचनाकारों की श्रेणी में हैं जिन्होंने सजग होकर समाज को न केवल देखा बल्कि परखा भी और उनमें निहित असमानताओं और दमन की प्रकृति के विरोध में अंधकार से लड़ने वाले विचार दिए। उनका साहित्य ही नहीं बल्कि उनके समाजसुधार से जुड़े कार्य भी चेतना से लैस रहे।
साहित्य की खिड़की के भीतर झाँकने पर महादेवी वर्मा के रचना संसार का सुंदर दृश्य दिखाई देता है। आज जबकि देश ही नहीं संसारभर में संवेदनहीनता लोगों के भीतर प्रबल होती जा रही है, आवश्यकता है कि साहित्य की शरण ली जाए, जो हमें अमरत्व का सही अर्थ समझा सके। महादेवी वर्मा का रचना संसार ऐसा है कि सैर के बाद लौटकर वह आपको पुनः किसी अज्ञात प्रेम की परिकल्पना में डुबो देगा।
“जब असीम से हो जायेगा
मेरी लघु सीमा का मेल,
देखोगे तुम देव! अमरता
खेलेगी मिटने का खेल!”
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