May 13, 2021

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“सिर्फ़ दो संदेश… साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद!”- शहीद दिवस पर विशेष

“सिर्फ़ दो संदेश.. साम्राज्यवाद मुर्दाबाद और ‘इंक़लाब ज़िंदाबाद!”
देश को दिया शहीद भगत सिंह का यह आख़री संदेश उनके जीवन का निचोड़ है। कहना न होगा कि हमारे देश में जब-जब राजनयिकों को किसी देवता की तलाश हुई तो सभी ने एक सुर में भगत सिंह का नाम लिया। पर भगत सिंह वास्तव में क्या उसी ईश्वरीय शक्ति का प्रतिरूप थे? उनकी बचपन की कहानियों के इतर कौन थे भगत सिंह?
क़िताबों वाले भगत सिंह
भगत सिंह को क़िताबें पढ़ने का बेहद शौक़ था। इतना कि वे आपने आख़री दिनों में भी एक क़िताब पढ़ने की अभिलाषा लिए सो गए। वे हर प्रकार के विषय में दिलचस्पी रखते थे चाहे वह राजनीतिक हो या ग़ैर-राजनीतिक। उनके पसंदीदा रचनाकारों में कार्ल मार्क्स, रूसो, रवींद्रनाथ ठाकुर, चार्ल्स डिकेन्स, बर्ट्रेंड रसेल, लाला लाजपतराय, विलियम वर्ड्सवर्थ, मिर्ज़ा ग़ालिब, उमर खैय्याम, रामानंद चटर्जी और बर्नार्ड शॉ शामिल थे।
भगत सिंह बेहद कम उम्र में कई भाषाओं में निपुण थे। उनकी प्राप्त चिट्ठियाँ पढ़कर इस बात की पुष्टि होती है। बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि भगत सिंह ने जेल में रहते हुए चार क़िताबें लिखीं थीं पर वे सभी नष्ट हो गईं। उनकी याद के तौर पर बची उनकी डायरी पढ़कर उनके इतनी सी उम्र में सांसारिक, सामाजिक और साहित्यिक ज्ञान का पता लगाना मुश्क़िल नहीं है। एक ऐसा युवा जो आज़ादी का ख़्वाब लिए बंदूकों से घिरा था, उसके भीतर का कवि और विचारक भी उतना ही ज़िंदा था जितना कि उसके इरादे।उनकी डायरी में दर्ज कुछ पंक्तियां हैं-
“प्रेमी, पागल और कवि एक ही तरह से बने होते हैं।”
“सामाजिक प्रगति कुछ लोगों के विद्रोह पर नहीं बल्कि समृद्ध लोकतंत्र पर निर्भर करती है। पूरे विश्व में भाईचारा केवल तभी प्राप्त किया जा सकता है जब अवसरों में समानता हो – सामाजिक, राजनीतिक और व्यक्तिगत जीवन में अवसर।”
जेल से अपने भाई को लिखे एक पत्र में वे शायराना ढंग से क्रांति के गीत को शब्दबद्ध करते हुए लिखते हैं-
“उन्हें यह फ़िक्र है हरदम, नयी तर्ज़-ए-ज़फ़ा क्या है?।
हमें यह शौक है देखें, सितम की इंतिहा क्या है?।।
दहर से क्यों ख़फ़ा रहें, चर्ख का क्या ग़िला करें।
सारा जहाँ अदू सही, आओ… मुक़ाबला करें।।”
जब आख़री बार उनके वक़ील मेहता उनसे मिलने जेल पहुँचे तो उन्होंने मुस्कुराते हुए उनका स्वागत किया और पूछा कि क्या आप मेरी क़िताब “रेवोल्यूशनरी लेनिन” लाये? भगत सिंह यह क़िताब पढ़ना चाहते थे पर जब समय से 12 घण्टे पूर्व ही उन्हें फँसी देने का फ़रमान जारी हुआ तो उनके मुँह से निकला “क्या आप मुझे इस क़िताब का एक अध्याय भी ख़त्म नहीं करने देंगे?”
भगत सिंह बनाम ईश्वर
भगत सिंह को समझने वाले ये जानते हैं कि वे नास्तिक थे। आजीवन उन्होंने कभी ईश्वर की अवधारणा को नहीं स्वीकारा। उनका मानना था कि जब मनुष्य बनी बनाई परिपाटी से इतर तर्क की कसौटी पर समाज के विश्वास को कसता है तो उसे मालूम चलता है कि दरअसल ईश्वर जैसा कुछ है ही नहीं। उन्होंने अपनी इस बात का पक्ष रखते हुए एक बेहतरीन क़िताब लिखी जिसका नाम है “मैं नास्तिक क्यों हूँ?”
ये क़िताब ईश्वर की उपस्थित को नकारते हुए भगत सिंह के मन के प्रश्नों और तर्कों का एक सुंदर संकलन कही जा सकती है। वे क़िताब की शुरुआत में कहते हैं-
“मैं सर्वशक्तिमान परमात्मा के अस्तित्व को मानने से इनकार करता हूँ। मैं नास्तिक इसलिए नहीं बना कि मैं अभिमानी हूँ, पाखंडी या निरर्थक हूँ। मैं न तो किसी का अवतार हूँ न ईश्वर का दूत और न ही ख़ुद परमात्मा।”
भगत सिंह ने सदैव ही परंपरागत तरीके से चलने वाली आस्था पर सवाल उठाए हैं। इस भेड़ चाल में सदियों से फँसें लोगों की प्रवृत्ति पर वे प्रखरता से लिखते हैं-
“हमारे पूर्वजों को ज़रूर किसी सर्वशक्तिमान में आस्था रही होगी कि उस विश्वास के सच या उस परमात्मा के अस्तित्व को जो भी चुनौती देता है, उसे क़ाफ़िर या पाखण्डी कहा जाता है। चाहे उस व्यक्ति के तर्क इतने मज़बूत क्यों न हों कि उन्हें झुठलाना नामुमकिन हो या उसकी आत्मा इतनी सशक्त क्यों न हो कि उसे ईश्वर के प्रकोप का डर दिखाकर भी झुकाया नहीं जा सकता और इसलिए ऐसे व्यक्ति को अभिमानी कहकर उसकी निंदा की जाती है।”
भगत सिंह युवाओं के सम्बंध में आशा से भरे हैं और उन्हें मार्गदर्शन देने के लिहाज़ से पुरानी मान्यताओं के बरअक्स तर्क जुटाने की बात पर ज़ोर देते हुए कहते हैं-
“आगे बढ़ते रहने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए ज़रूरी है कि वो पूरानी आस्था के सभी सिद्धान्तों में दोष ढूँढे।”
भगत सिंह ने अपनी समझ और मान्यताओं की आधारभूमि को पढ़कर अर्जित किया है और इसीलिए वे अपने निष्कर्ष के प्रति आत्मविश्वासी हैं। एक बार जब उन्होंने अपने मित्र को नास्तिक होने की बात बताई तो उसने कहा कि अंत समय आने पर तुम भी ईश्वर में यक़ीन करने लग जाओगे। इसपर भगत सिंह ने सुंदर शब्दों में कहा-
“नहीं मेरे प्यारे मित्र, ऐसा कभी नहीं होगा। मैं इसे अपने लिए अपमानजनक और नैतिक पतन की वजह समझता हूँ, ऐसी स्वार्थी वजहों से मैं कभी प्रार्थना नहीं करूँगा।”
और ऐसा ही हुआ… फाँसी से कुछ घण्टे पूर्व जब उनसे कहा गया कि वाहेगुरु को याद कर लो, तब उन्होंने कहा कि मैं एक नास्तिक रहा हूँ अब अंतिम समय में ईश्वर के आगे झुकने से वो मुझे स्वार्थी समझेगा… और अंत तक इबादत में अपने हाँथ नहीं उठाए।
भगत सिंह और उनका क्रांतिकारी सपना
भगत सिंह ने जब 19 वर्ष की आयु में अपना घर छोड़ तो अपनी चिट्टी में लिखा “मेरा जीवन एक महान उद्देश्य के लिए समर्पित है और वह है देश की स्वतंत्रता। इसलिए कोई भी आराम या सांसारिक सुख मुझे नहीं लुभाता।”
भगत सिंह जानते थे कि केवल क्रांतिकारियों के संगठित होने मात्र से देश को अंग्रेज़ो से आज़ादी नहीं मिलेगी इसलिए उन्होंने अपने साथियों संग ‘हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन’ का गठन किया जिसका नाम बाद में उन्होंने ‘हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन’ रख दिया था।
इस संगठन में उनके ज़िम्मे जो काम आया वो था हिंदुस्तान की आम जनता को काकोरी कांड(1925) जैसी घटनाओं के विषय में अवगत कराना ताकि साधारण जनता भी क्रांति की इस लहर को व्यापक रूप से अवगत हो सके। इसी बीच भगत सिंह को लगा कि लोगों को जागरूक करने या उकसाने के लिए एक नाटकीय घटना की आवश्यकता है जो लोगों के भीतर क्राँति की भावना को स्फूर्त कर दे। इसी क्रम में उन्होंने अपने साथियों के साथ मिलकर लेजिस्लेटिव असेम्बली पर बम गिराने की योजना बनाई जिसके लिए बाद में उन्हें फाँसी दी गयी।
“अगर बहरों को सुनाना है, तो धमाका करना ज़रूरी है। जब हमने बम फेंका तो हमारा इरादा किसी को मारना नही था। हमने ब्रिटिश सरकार पर बम फेंका था। अंग्रेजों को भारत छोड़ना पड़ेगा और हमें आज़ाद करना पड़ेगा।”
भगत सिंह ने आजीवन क्रांति को जिया और एक क्रांति की तरह ही अमर हुए। जिस व्यक्ति की स्मृतिभर से रोम-रोम क्रांति के गीत से झूम उठता है वह व्यक्ति हमारी स्मृतियों में ज़िंदा है। जब तक दुनियाँ में “इंक़लाब ज़िंदाबाद” का नारा बुलंद होता रहेगा, भगत सिंह जीवित रहेंगे क्योंकि वे एक विचार हैं और जैसा कि उन्होंने ख़ुद कहा है-
“व्यक्ति को कुचलने से वे विचारों को नहीं कुचला जा सकता।”
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