April 11, 2021

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असहयोग आंदोलन से सैन्य सत्ता को चुनौती -म्यांमार

सैन्य सत्ता का विरोध आसान नहीं है।लेकिन लोकतंत्र की एक झलक देख चुके लोग उसे जमकर चुनौती दे रहे हैं।कई लोग मारे गए लेकिन विरोध के स्वर मध्यम नहीं पड़ा है। हम बात कर रहे हैं म्यांमार की। अभी तक 400 से ज्यादा लोग इस आंदोलन की बलि चढ़ गए है। 

म्यांमार का रक्त रंजित इतिहास 

एक ऐसा देश जो कई दशकों तक लोकतंत्र के लिए तरसता रहा। 1948 में आज़ाद हुआ म्यांमार में लंबे समय तक लोकतंत्र नहीं रहा। 1968 में सेना ने तख्ता पलट कर दिया। उसकी अगुवाई सेना के अधिकारी ‘ने विन’ ने की थी।म्यांमार में जून्टा के ज़रिये सत्ता पर सेना का कब्ज़ा बरक़रार रहा। विरोधियों के खिलाफ कार्रवाई होती रही।विरोध की आवाज़ को दबाया जाता रहा, करीब दो दशक बाद सेना की सत्ता के खिलाफ आवाज़ तेज़ होने लगी। 1988 में कई जगहों पर विरोध प्रदर्शन हुए।

आंग सांग सू की देश वापस लौट आयीं थी लेकिन उन्हें घर में कैद कर दिया गया। वो आंग सांग की बेटी हैं जिन्होंने म्यांमार जिसका नाम बर्मा भी था की आज़ादी में अहम भूमिका निभाई थी।सू की ने कैद रहते हुए ही एक राजनीतिक दल बनाया।चुनावों में बंपर जीत भी मिली लेकिन सेना ने चुनाव परिणाम को मानने से इंकार कर दिया।

आंग सांग सू

करीब 22 साल आंग सांग सू की कैद रहीं। इसी दौरान उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला था। 2010 में आंग सांग सू की को रिहा किया गया और 2012 में वो संसद के लिए चुनी गयीं। 2015 में उनकी पार्टी को शानदार जीत मिली। हालांकि सेना का सत्ता पर साया घटा तो था लेकिन ख़त्म नहीं हुआ था। नए नियम बना दिए गए जिससे राष्ट्रपति पद तक आंग सांग सू की नहीं पहुंच पायीं।

सरकार चलाने के लिए स्टेट कौंसिलर का पद बनाया गया। आंग सांग सू की ने स्टेट कौंसिलर के तौर पर सत्ता चला।. लेकिन बड़ी संख्या में रोहिंग्या के पलायन और उनकी हत्या की वजह से वो सवालों में भी घिरती रहीं। अब आते हैं साल 2020 पर ..देश में आम चुनाव हुए लेकिन सेना ने कहा कि बहुत सारी गलतियां हुई है। चुनाव को रद्द किया जाए। चुनाव आयोग ने सेना की मांग को ख़ारिज कर दिया।

एक बार फिर लोगों के मन में डर होने लगा था कि क्या फिर म्यांमार की सत्ता पर सेना कब्ज़ा कर लेगी. लोगों का डर सही साबित होने लगा था। राजधानी नाएप्यीडॉ में सेना कि आवाजाही बढ़ने लगी थी।अहम इमारतों के पास भी बड़ी संख्या में सैनिक दिखने लगे थे।एक फरवरी को सेना ने एक साल के लिए देश में इमरजेंसी कि घोषणा कर दी। तमाम नेताओं को उनके घरों में कैद कर दिया गया. लेकिन सेना ने बड़ी गलती कर दी थी। उसे लग रहा था कि देश अभी भी 1968 के दौर में ही है और उसके फैसले का कोई विरोध नहीं होगा पर हुआ इसका ठीक उल्टा।

बड़ी संख्या में लोग लोकतंत्र बहाली कि मांग पर सड़कों पर निकल आये। उन्हें ना सेना कि गोली रोक पायी ना सेना की हिरासत में यातना का डर। म्यांमार के हर शहर में प्रदर्शन तेज होता गया।कई जगह तो सैनिकों ने निहत्थे लोगों पर गोली चलाने से इनकार कर दिया।लोगों ने असहयोग का रास्ता अपना लिया है।

दुनिया भर की कंपनियों से देश में उत्पादन रोकने की अपील की है। साथ ही खुद भी काम पर जाने से इनकार कर दिया है। म्यांमार की सैन्य सरकार की मुश्किलें बढ़ने लगी है। उन्हें समझ नहीं आ रहा असहयोग से कैसे निपटें।वहीं लोगों की स्पष्ट मांग है की लोकतंत्र से कम कुछ भी मंज़ूर नहीं है

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