April 11, 2021

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कोरोना इम्पैक्ट :महीनों से समुद्र में फँसें नाविक हो रहे हैं अवसाद का शिकार

“43 वर्षीय रितेश मेहरा ने ये नहीं सोचा था कि जुलाई में चार महीनों की उनकी समुद्री यात्रा बस इंतज़ार बनकर रह जायेगी और वे कप्तान के बतौर इस जहाज पर अगले वसंत तक फँसे रहेंगे।”

रितेश मेहरा जो की एक हल्दिया में मौजूद 80,000 टन के जहाज के कप्तान थे उन्होंने अपनी व्यथा ज़ूम’ के ज़रिए समाचार एजेंसी रॉयटर्स को शेयर की थी। फिलहाल मेहरा इस महीने आख़िरकार घर लौट आये पर उन्होंने बताया की रोटेशन पालिसी के तहत उनको बहुत पहले ही घर जाना था लेकिन ऐसा दूसरी बार हुआ है कि बंदरगाह क्रू में बदलाव की अनुमति नहीं दी थी।

Credit- Reuters
समुद्र में 20 साल का अनुभव रखने वाले मेहरा ने बतौर कप्तान अपने 23 क्रू साथियों की हिम्मत बाँधने की कोशिश की ,जो थकान और सामाजिक अलगाव से जूझ रहे थे।
मेहरा ने बताया, “इस जगह पर बँधे रहने को आप एक प्रकार से जेल कह सकते हैं, जिसे क्रू झेल रहा है।”
                        ‘वे अपनी नौकरी से ज़्यादा इस क़ैद के बारे में सोच रहे हैं।’
‘अंतरराष्ट्रीय चैंबर ऑफ़ शिपिंग’ ने पिछले हफ़्ते कहा था कि महामारी के कारण समुद्र में एक लाख समुद्री यात्री फंसे हुए हैं।
क्रू रोटेशन एक जटिल प्रक्रिया है, जिसमें ट्रांज़िट वीज़ा हासिल करना और नाविकों को अंतरराष्ट्रीय बंदरगाह पर उतरने के बाद ले जाने के लिए चार्टर्ड उड़ानों की व्यवस्था करना शामिल है।जब एक प्रतिस्थापन को बोर्ड पर लाया जा सकता है तब प्रभावी संचालन और सुरक्षा बनाए रखने के लिए, नाविकों को केवल एक ही जहाज से उतरने की अनुमति दी जाती है।जहाज के बंदरगाह पर आने के बाद सही एंट्री परमिट, और कोरोना के कारण क्वारन्टीन और टेस्टिंग की कम समय में व्यवस्था करने की चुनौती भी होती है।नतीजतन, महामारी के दौरान चालक दल के रोटेशन को अक्सर कम सूचना पर रद्द कर दिया जाता है।
Credit- Reuters
रेवरेंड स्टीफ़न मिलर, जो आमतौर पर नाविकों को परामर्श और सलाह देने के लिए सवार हो जाते थे, अब सिम कार्ड और स्नैक्स सहित चीज़ों की आपूर्ति के साथ बैग वितरित करने के लिए भी काम कर रहे हैं। वे कहता हैं कि वे नाविकों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर चिंतित हैं।
उन्होंने कहा, “आप केवल कल्पना कर सकते हैं कि आप घर जाने की योजना बना रहे हैं, हो सकता है कि कई महीनों में पहली बार आप अपने छोटे बच्चे को देखें और फिर उसे आपसे दूर कर दिया जाए।”
यह ज़ाहिर तौर पर उदास करने वाली बात है, जिससे अवसाद हो सकता है। यह दुख की बात है कि अगर इसके बारे में बात नहीं की जाती है, तो लोग यह सोचने पर मजबूर हो जाते हैं कि जीवन जीने योग्य रहा ही नहीं।
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