October 26, 2021

MotherlandPost

Truth Always Wins!

सातवां नवरात्र: माता कालरात्रि के बारे में सम्पूर्ण जानकारी दे रहे हैं पंडित पुरुषोत्तम सती

माँ दुर्गा की सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती हैं दुर्गा पूजा के सातवें दिन माँ कालरात्रि की उपासना का विधान है।पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां कालरात्रि श्याम वर्ण की हैं. इसलिए उनका नाम कालरात्रि है।

देवी कालात्रि को व्यापक रूप से माता देवी – काली, महाकाली, भद्रकाली, भैरवी, रूद्राणी, चामुंडा, चंडी और दुर्गा के कई विनाशकारी रूपों में से एक माना जाता है।मां कालरात्रि की पूजा करने से भूतप्रेत भी भाग जाते हैं. मां कालरात्रि बेहद शक्तिशाली हैं, जो लोग विधि विधान से मां कालरात्रि की पूजा अर्चना करता है, उसे संकटों से मुक्ति मिल जाती है. इसीलिए इन्हें शुभकंरी माता के नाम से भी पुकारते हैं.

एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता | लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी || वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा | वर्धन्मूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयन्करि ||

मां कालरात्रि देखने में बहुत ही भंयकर है लेकिन इनका हृदय बहुत ही कोमल है. इनकी नाक से आग की भयंकर लपटें निकलती हैं. मां कालरात्रि की सवारी गर्धव यानि गधा है. मां कालरात्रि का दायां हाथ हमेशा उपर की ओर उठा रहता है, इसका अर्थ मां सभी को आशीर्वाद दे रही हैं. मां कालरात्रि के निचले दाहिने हाथ की मुद्रा भक्तों के भय को दूर करने वाली है. उनके बाएं हाथ में लोहे का कांटेदार अस्त्र है. निचले बाएं हाथ में कटार (खड्ग) है।मां कालरात्रि का प्रिय पुष्प रातरानी है. मां कालरात्रि की पूजा तांत्रिक विशेष सिद्धि की प्राप्ति के लिए निशा काल यानी कि रात्रि के समय करते हैं

मां कालरात्रि की कथा

पौराणिक कथा के मुताबिक दैत्य शुंभ-निशुंभ और रक्तबीज ने तीनों लोकों में अपना आंतक मचाना शुरू कर दिया तो देवतागण परेशान हो गए और भगवान शंकर के पास पहुंचे. तब भगवान शंकर ने देवी पार्वती से राक्षसों का वध कर अपने भक्तों की रक्षा करने के लिए कहा. भगवान शंकर का आदेश प्राप्त करने के बाद पार्वती जी ने दुर्गा का रूप धारण किया और शुंभ-निशुंभ का वध किया. लेकिन जैसे ही मां दुर्गा ने रक्तबीज को मारा उसके शरीर से निकले रक्त की बूंदों से लाखों रक्तबीज उत्पन्न हो गए. तब मां दुर्गा ने मां कालरात्रि के रूप में अवतार लिया. मां कालरात्रि ने इसके बाद रक्तबीज का वध किया और उसके शरीर से निकलने वाले रक्त को अपने मुख में भर लिया.

रात्रि में की जाती है विशेष पूजा

मां कालरात्रि की विशेष पूजा रात्रि में करने का विधान है. तांत्रिक अपनी मंत्र साधना के लिए इस दिन का वर्ष भर इंतजार करते हैं. मान्यता है कि इस दिन मंत्र सिद्ध होते हैं.इसीलिए सप्तमी की रात्रि सिद्धियों की रात भी कही गई है. मां कालरात्रि की पूजा आरंभ करने से पहले कुमकुम, लाल पुष्प, रोली लगाएं और उनके आगे तेल का दीपक जलाएं. मां को लाल फूल अर्पित करें. साथ ही गुड़ का भोग लगाएं. इसके बाद मां के मन्त्रों का जाप या सप्तशती का पाठ करें. इस दिन मां की पूजा के बाद शिव और ब्रह्मा जी की पूजा की जाती है. जहां भी बलि प्रथा है अभी, वहां कालरात्रि की पूजा के बाद सुबह के समय बलि दी जाती है।

कालरात्रि का मंत्र

1- या देवी सर्वभूतेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
2- ॐ कालरात्रि देव्ये नम:

3- ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डाय विच्चे

4- ॐ ऐं ह्रीं क्रीं कालरात्रै नमः |

कालरात्रि कवच

ऊँ क्लीं मे हृदयम् पातु पादौ श्रीकालरात्रि।

ललाटे सततम् पातु तुष्टग्रह निवारिणी॥

रसनाम् पातु कौमारी, भैरवी चक्षुषोर्भम।

कटौ पृष्ठे महेशानी, कर्णोशङ्करभामिनी॥

वर्जितानी तु स्थानाभि यानि च कवचेन हि।

तानि सर्वाणि मे देवीसततंपातु स्तम्भिनी॥

पंडित पुरूषोतम सती ( Astro Badri)
Greater Noida West
9450002990

Translate »