September 28, 2021

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ट्रिब्यूनल सुधार एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट केंद्र से हुआ नाराज़, कहा ‘लगता है उन्हें अदालत के फ़ैसले का कोई सम्मान नहीं’

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रिब्यूनल सुधार एक्ट और नियुक्तियों के संबंध में केंद्र सरकार से कड़ी नाराज़गी ज़ाहिर की है। कोर्ट ने सरकार के लापरवाही के रवैये और अदालत के फ़ैसलों के अवहेलना पर सख़्त टिप्पणी की।

 

Credit- Bar and Bench

 

केंद्र को फटकार लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि “हमें लगता है सरकार को अदालत के फ़ैसलों का कोई सम्मान नहीं है। आप हमारे धैर्य की परीक्षा ले रहे हैं। हमने पिछली बार भी पूछा था कि आपने ट्रिब्यूनलों में कितनी नियुक्तियां की हैं। हमें बताइए कि कितनी नियुक्तियां हुई हैं। हमारे पास तीन ही विकल्प हैं, पहला कानून पर रोक लगा दें, दूसरा ट्रिब्यूलनों को बंद कर दें और खुद ट्रिब्यूनलों में नियुक्ति करें और  फिर सरकार के खिलाफ अवमानना की कार्यवाही शुरू करें।”

इस बाबत चीफ़ जस्टिस ने कहा कि ‘हम जजों की नियुक्ति के मामले पर आपने जिस तरह से कदम उठाए, उसकी सराहना करते हैं। लेकिन ट्रिब्यूनल के लिए एक सदस्यों की नियुक्ति के लिए इतनी देरी का कारण क्या है, यह समझ से परे है। NCLT में रिक्तियां पड़ी हैं। अगर आपको इस कोर्ट के दो जजों पर भरोसा नहीं है, तो फिर हम क्या कह सकते हैं। फ़िलहाल हम नए क़ानून पर भरोसा नहीं कर सकते जब हमारे आदेशों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है।’

इस दौरान एसजी तुषार मेहता ने 6/09/21 के वित्त मंत्रालय के पत्र को पढ़ा कि सदस्यों की नियुक्ति पर निर्णय 2 महीने के भीतर लिया जाएगा। जस्टिस नागेश्वर राव ने कहा, “हम जिन ट्रिब्यूनलों की सिफ़ारिशों के बारे में बात कर रहे हैं, वे इस सुधार विधेयक के अस्तित्व में आने से 2 साल पहले भेजे गए थे। आपने उन्हें नियुक्त क्यों नहीं किया? क़ानूनों के अनुसार की गई सिफ़ारिशें जैसे वे तब मौजूद थीं, उन्हें क्यों नहीं किया जाता?”

जस्टिस डीवीई चंद्रचूड ने कहा कि, “मेरे पास IBC के बहुत मामले आ रहे हैं, ये कॉरपोरेट के लिए बहुत ज़रूरी हैं, लेकिन NCLAT और NCLT में नियुक्तियां नहीं हुई हैं तो केसों की सुनवाई नहीं हो रही है। सशस्त्र बलों के ट्रिब्यूनलों में भी पद खाली हैं। लिहाज़ा सारी याचिकाएं हमारे पास आ रही हैं।”

उन्होंने आगे कहा, “मैंने NCDRC  के लिए चयन समिति की अध्यक्षता की है, CJI  ने NCLAT की अध्यक्षता की है। न्यायमूर्ति राव ने समितियों की अध्यक्षता की है। नए एमओपी में प्रावधान है कि पहले आईबी नामों को मंज़ूरी देता है फिर हम सिफ़ारिशें भेजते हैं। लेकिन अनुशंसित नाम या तो हटा दिए गए हैं या नहीं लिए गए हैं।”

जस्टिस चंद्रचूड़ ने आगे जोड़ा, “यह किसी एक व्यक्ति द्वारा भेजे गए नाम नहीं हैं। यह एक साथ बैठे जजों और वरिष्ठ अधिकारियों की एक समिति है। अब आप जो ट्रिब्यूनल अधिनियम लाए हैं, वह वस्तुतः पहले से हटाए गए प्रावधानों का दूसरा रूप है। जस्टिस राव ने कहा, हमने लगभग 55 लोगों का साक्षात्कार लिया है और फिर टीडीसैट के लिए लगभग नामों की सिफारिश की है। आप सदस्यों की नियुक्ति न करके ट्रिब्यूनल को कमजोर कर रहे हैं।”

जस्टिस डीवीआई चंद्रचूड ने कहा, “हम एक अधिनियम को रद्द करते हैं और फिर दूसरा नया सामने आ जाता है। यह एक समान पैटर्न बन गया है।”

इसके बाद मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “हमें आप पर भरोसा है, हम आशा करते हैं कि आप सरकार को एक के बाद एक क़ानून बनाने के लिए कहने वाले नहीं हैं। शायद नौकरशाह ऐसा करते हैं पर हम बहुत परेशान हैं।”

बता दें कि सीजेआई एनवी रमना, जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल नागेश्वर राव की बेंच, ट्रिब्यूलनों में नियुक्तियों और ट्रिब्यूनल सुधार एक्ट के ख़िलाफ़ याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है।

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