September 24, 2021

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पेगासस स्कैंडल पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी, कहा ‘बहस सिर्फ़ अदालत में होनी चाहिए, सोशल मीडिया पर नहीं’

मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने पेगासस स्कैंडल मामले में अहम टिप्पणी की है। सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश एनवी रमना ने कहा कि बहस सिर्फ़ कोर्ट में होनी चाहिए, सोशल में नहीं।

 

 

सुप्रीम कोर्ट पेगासस जासूसी मामले में SIT जाँच की माँग पर मंगलवार को सुनवाई करते हुए याचिकाकर्ताओं से कहा कि आपको जो कुछ कहना है आप अपने हलफ़नामे में कहें। हम आपका सम्मान करते हैं, लेकिन जो बहस हो वो अदालत में हो। सोशल मीडिया पर सामानांतर बहस न हो।

न्यायमूर्ति रमना ने कहा, ‘याचिकाकर्ता मीडिया में बयान दे रहे हैं। हम चाहते है कि सारी बहस कोर्ट में हो। अगर याचिकाकर्ता सोशल मीडिया पर बहस करना चाहते है तो ये उन पर है। लेकिन अगर वो कोर्ट में आए हैं तो उन्हें कोर्ट में बहस करनी चाहिए। उन्हें कोर्ट पर भरोसा रखना चाहिए। जो बात है वो कोर्ट में कहें, एक समानांतर कार्यवाही सोशल मीडिया के ज़रिये न करें।’
कोर्ट की इस बात पर कपिल सिब्बल ने सहमति जताई। अब 16 अगस्त को मामले की अगली सुनवाई होगी।

इस मामले में केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता सुनवाई में पेश हुए। उन्होंने अदालत को बताया कि यशवंत सिन्हा को छोड़कर बाकी याचिकाएं मिल गई हैं। उन्होंने कहा ‘हमें सरकार से निर्देश के लिए समय चाहिए। शुक्रवार से पहले सुनवाई ना रखी जाए।’

बता दें कि इन याचिकाओं में एडिटर्स गिल्ड ऑफ़ इंडिया और वरिष्ठ पत्रकारों एन. राम तथा शशि कुमार और पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा द्वारा दी गई अर्जियां भी शामिल हैं। मामले की पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि अगर मीडिया रिपोर्ट्स सही हैं तो ये आरोप काफ़ी गंभीर हैं।

मुख्य न्यायाधीश रमना ने शर्मा से कहा, “आपकी याचिका में अख़बारों की कटिंग के अलावा क्या डिटेल है? आप चाहते हैं कि सारी जांच हम करें और तथ्य जुटाएं। ये जनहित याचिका दाखिल करने का कोई तरीका नहीं है।”

पेगासस पर दो जजों की बेंच ने कहा कि ‘इस मामले में विदेशी कंपनियां भी शामिल हैं। यह एक जटिल मसला है। नोटिस लेने के लिए केंद्र की ओर से किसी को पेश होना चाहिए था।’ चीफ़ जस्टिस ने इस बात को भी रेखांकित किया कि यह आश्चर्य की बात है कि 2019 में पेगासस का मुद्दा सामने आया था और किसी ने भी जासूसी के बारे में सत्यापन योग्य सामग्री एकत्र करने का कोई गंभीर प्रयास नहीं किया।

उन्होंने कहा कि अधिकांश जनहित याचिकाएं राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय मीडिया के समाचार पत्रों की कटिंग पर आधारित हैं। उन्होंने कहा, “हम ये नहीं कह सकते कि इस मामले में बिल्कुल कोई सामग्री नहीं है। हम सबको समाचार पत्रों की रिपोर्ट और प्रतिष्ठित पत्रकारों की सामग्री नहीं कहना चाहते। जिन लोगों ने याचिका दायर की उनमें से कुछ ने दावा किया कि उनके फोन हैक हो गए हैं। आप आईटी और टेलीग्राफ़ कानून के प्रावधानों को अच्छी तरह जानते हैं। ऐसा लगता है कि उन्होंने शिकायत दर्ज करने का कोई प्रयास नहीं किया। ये चीजें हमें परेशान कर रही हैं।”

CJI की इस बात पर वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि ‘सूचना तक हमारी सीधी पहुंच नहीं है। एडिटर्स गिल्ड की याचिका में जासूसी  के 37 सत्यापित मामले हैं।’ CJI ने इसपर कहा, “मैं यह भी नहीं कहना चाहता कि दलीलों में कुछ भी नहीं है। याचिका दायर करने वाली कुछ याचिकाएं प्रभावित नहीं होती हैं और कुछ का दावा है कि उनके फोन हैक हो गए हैं, लेकिन उन्होंने शिकायत दर्ज करने का प्रयास नहीं किया है।”
साथ ही मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि जिन लोगों ने याचिकाएं डाली हैं वे जानकर और साधन संपन्न हैं। उन्हें इसमें अधिक सामग्री डालने के लिए अधिक मेहनत करनी चाहिए थी।

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