September 26, 2021

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नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिवस पर कुछ उनकी यादे

23 जनवरी का दिन वैसे तो हर किसी के लिए एक आम दिन की तरह ही है, लेकिन इस दिन एक ऐसे जाबाज़ योद्धा का जन्म हुआ था, जिसने ना केवल भारतीय राजनीति को प्रभावित किया, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अमिट छाप छोड़ी। वह योद्धा जिसने महात्मा गांधी को सबसे पहले राष्ट्रपिता की उपाधि दी थी, वह योद्धा जिसका कायल जर्मनी के चांसलर एडॉल्फ हिटलर भी हुआ करते थे। लेकिन समय की धारा में बहने साथ वह योद्धा इतिहास के पन्नों में ना जाने कहीं खो गया है। जी हां, आज हम बात कर रहे हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस की।

विलायत से लौटने के बाद सुभाष चंद्र बोस भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जुड़ गए। 1938 में कांग्रेस अध्यक्ष चुने जाने के बाद लगातार विरोध को देखते हुए उन्होंने स्माभिमानपूर्वक स्वयं ही कांग्रेस छोड़ दिया। सुभाष चंद्र बोस का मानना था कि भारत से अंग्रेजों को निकालने के लिए अंग्रेजों के दुश्मनों से मिलकर ही आजादी हासिल की जा सकती है। उनके इन विचारों को देखते हुए उन्हें ब्रिटिश सरकार ने कोलकाता में नजरबंद कर दिया। लेकिन वह अपने भतीजे शिशिर कुमार बोस की सहायता से वहां से भाग गए औऱ आफगानिस्तान से होते हुए सोवियत संघ के रास्ते जर्मनी जा पहुंचे।

हिटलर भी था  नेताजी की काबिलियत के कायल।

राजनीति में आने के पहले नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने पूरी दुनिया का भ्रमण किया। नेताजी ने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ और देश की आजादी के लिए लगातार प्रयास करते रहे और कई लोगों को खुद से जोड़ा। इस सिलसिले में नेताजी ने 1943 में जर्मनी को छोड़ दिया और जापान पहुंचे। वहीं कुछ दिनों वहां रहने के बाद सिंगापुर पहुंचे। जहां उन्होंने आजाद हिंद फौज की स्थापना की औऱ इस फौज में उन्होंने जुनूनी लोगों को जगह दी जो देश के लिए कुछ करना चाहते थे, मर मिटना चाहते थे अपनी जान की परवाह किए बगैर। नेताजी की एक खास बात यह थी की वह महिलाओं और पुरुषों में किसी से कोई भेदभाव नहीं करते थे। यही कारण था कि उन्होंने महिलाओं के लिए रानी झांसी रेजीमेंट का भी गठन किया। जिसकी कैप्टन लक्ष्मी सहगल बनीं।

जनवरी 1942 मे नेताजी ने रेडियो बर्लिन से प्रसारण करना शुरू किया, जिससे भारत के लोगों में उत्साह बढ़ा और वो साल 1943 में जर्मनी से सिंगापुर आ गए। जिसके बाद उन्होंने पूर्वी एशिया में रास बिहारी बोस से स्वतंत्रता आंदोलन का कमान लिया और आजाद हिंद फौज का गठन करके युद्ध की तैयारी शुरू कर दी।

नेताजी ने भारत को स्वतंत्रता दिलाने के लिए 1943 में ‘आजाद हिंद फौज’ की स्थापना की और 4 जुलाई 1944 को बर्मा पहुंचे। यहीं पर उन्होंने प्रसिद्ध नारा दिया, तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा। जनरल शाहनवाज के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश सेना के छक्के छुड़ाते हुए भारत में लगभग 20,000 वर्गमील इलाके पर अपना कब्जा जमा लिया। लेकिन दुर्भाग्यवस द्वितिय विश्वयुद्ध शुरू हो गया और इसी बीच मित्र राष्ट्रों ने 6 अगस्त, 1945 को जापान के प्रमुख शहर हिरोशिमा और इसके तीन दिन बाद 9 अगस्त 1945 को नागासाकी पर परमाणु बम गिया दिए गए, जिससे जापान, इटली औऱ दूसरे देशों को घुटने टेकने को लेकर विवश होना पड़ा। हलांकि इस विफलता से नेताजी सुभाष चंद्र बोस को बेहद निराशा हुई लेकिन उन्होंने आजादी के लिए लगातार कोशिशें जारी रखी।

नेताजी की मौत आज भी पूरी दुनिया के लिए पहेली है!

इसी बीच 18 अगस्त 1945 को ताइवान के पास नेताजी की हवाई दुर्घटना में मौत हो गई, लेकिन उनका शव नहीं मिल पाया। नेताजी की मौत आज भी लोगों के लिए पहेली बनी हुई है। इसकी जांच के लिए भारत सरकार ने कई समितियों का गठन किया लेकिन अबतक कुछ भी साफ नहीं हो पाया।

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