January 21, 2022

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स्पष्ट नियमों के बिना CAA क़ानून के पूरे हुए दो साल

मोदी सरकार ने अभी तक नागरिकता (संशोधन) अधिनियम को लागू करने के लिए नियम नहीं बनाए हैं, जिसे 11 दिसंबर, 2019 को बड़े धूमधाम से पारित किया गया था।

 

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केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अब सीएए को लागू करने के लिए नियम बनाने के मद्देनज़र नए सिरे से विस्तार की मांग की है, जिसके पारित होने पर समूचे देश के अलग-अलग राज्यों में व्यापक स्तर पर विरोध प्रदर्शन हुए थे।

ये प्रदर्शन केवल भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में तेज़ी से फैले और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रदर्शकारियों को खासा समर्थन हासिल हुआ। इस बाबत “शाहीनबाग़ आंदोलन” ने सबसे ज़्यादा ख्याती बटोरी जिसके अंतर्गत महिलाओं का व्यापक जमावड़ा था।

सत्तारूढ़ भाजपा ने विरोध के बावजूद सीएए को आगे बढ़ाया। कई जानकारों और मीडिया रपटों के मुताबिक़ इस क़ानून को पार्टी के मूल हिंदुत्व एजेंडे के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।

 

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मुख्यतः इस क़ानून में भारत के पड़ोस में उत्पीड़न से बचने वाले हिंदुओं की रक्षा करने की प्रतिबद्धता थी। यह क़ानून 6 ग़ैर-मुस्लिम समुदायों को नागरिकता प्रदान करने की बात करता है जिन्होंने दिसंबर 2014 से पहले अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश से भारत में प्रवेश लिया था। हालांकि इसमें मुस्लिम समुदाय के लिए नागरिकता के नए रास्तों के ज़िक्र नहीं था जिसके कारण विरोध प्रदर्शन शुरू हुए थे।

 

क्या हिंदू शरणार्थियों को मिली नागरिकता?

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हालांकि मुसलमान को ही नहीं बल्कि पड़ोसी मुल्क़ पाकिस्तान से आने वाले हिन्दू शरणार्थियों को भी अबतक सरकार नागरिकता देने में विफल रही है।

समाचार एजेंसी बीबीसी हिंदी की एक विस्तृत रिपोर्ट बताती है लोग अबतक भारत की नागरिकता हासिल करने के लिए संघर्षरत ही हैं।

बीबीसी दिल्ली के मजनूं का टीला स्थित हिंदू शरणार्थियों की बस्ती के प्रधान के हवाले से लिखता है, “सिर्फ़ देश की राजधानी में पाकिस्तान से आये हिंदू शरणार्थियों की पांच बस्तियां हैं जबकि इनकी आबादी दस हज़ार के आस पास की है। ये बस्तियाँ मजनूं के टीले के अलावा रोहिणी, नांगलोई, आदर्श नगर और फ़रीदाबाद में बसी हुई हैं।”

ऐसी बस्तियों में रहने वालों की हालत बेहद ख़राब है। जीने के लिए बिजली पानी जैसी मूल सुविधाएं भी मुहाल हैं। छोटे-छोटे काम कर गुजर करने वाले सभी लोगों को आम जीवन जीने के लिए पुलिस के डंडे हमेशा ही खाने पड़ते हैं।

क़ानून आने के बाद इन्हें उम्मीद थी कि नागरिकता हासिल होगी लेकिन ऐसा होता फ़िलहाल नज़र नहीं आ रहा है।

इस बाबत बीबीसी एक अन्य नागरिक के हवाले से लिखता है, “हम तो बहुत खुश हुए थे कि अब क़ानून आ गया है। अब हमारी ज़िन्दगी बेहतर हो जायेगी। हमारे बच्चों का भविष्य संवर जाएगा। हमने सरकार का हर दरवाज़ा खटखटाया। लेकिन कहीं भी हमारी गुहार नहीं सुनी गयी। आज भी हम वहीं पर खड़े हैं जहाँ हम तब थे जब हम पकिस्तान से यहाँ 11 साल पहले आये थे। पता नहीं कब हमें नागरिकता मिलेगी।”

अब यह तो समय ही बताएगा कि गाजे-बाजे के साथ आया ये क़ानून कितनों को राहत देता है।

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