माँ भगवती दुर्गा के शारदीय नवरात्र 17 अक्टूबर से शुरू हो रहे हैं जो 25 अक्टूबर को संपन्न होंगे।
साधारणतया नवरात्र पितृ विसर्जन के दूसरे दिन से प्रारंभ होते हैं परन्तु इस बार अधिमास या मलमास के कारण एक महीने के इंतज़ार के बाद नवरात्र 17 अक्टूबर से प्रारम्भ होंगे।
सनातन संस्कृति में मां भगवती को सृष्टि का मूल माना जाता है और देवी माहात्म्य के अनेक प्रसंग देवी भागवत में मिलते हैं जिसके अनुसार त्रिदेवों को जो शक्ति संचालित करती है वो मां भगवती ही हैं जो विभिन्न अवसरों पर अपने अलग अलग रूपों में सृष्टि की रक्षा करती हैं चाहे भगवान विष्णु के हयग्रीव अवतार के समय उनका दर्शन देना हो अथवा मधु कैटभ के वध के लिए लिया अवतार हो। कभी वही दिव्य शक्ति हमको माता पार्वती के रूप में दिखती हैं तो कभी महाकाली रूप में सबका संघार करने को आतुर रहती हैं।
माता भगवती त्रिपुरसुंदरी का निवास मणिद्वीप में है।17 अक्टूबर से प्रारम्भ हो रहे शारदीय .नवरात्र में प्रथम दिन कलश स्थापना होती है और माता शैलपुत्री की पूजा होती है माता शैलपुत्री पार्वती जी को बोला जाता है। इनको ही उत्तराखंड में मां नंदा के नाम से जाना जाता है।

कलश स्थापना की विधि और इसमें जौ बौने का महत्व:
कलश स्थापना के दिन सर्वप्रथम पीतल, ताबे, कांसे के लोटे में कलावा बांधना चाहिए और उसमें गंगाजल, पंचरत्न इत्यादि डालकर उसमें पंचपल्वल (आम, पीपल, अशोक इत्यादि के पत्ते) दालें और उसके ऊपर से लाल कपडे पर बांधकर श्रीफल रखना चाहिए। यहां ध्यान रहे कि श्रीफल कच्चा नारियल नहीं होता है। देवी की प्रतिमा या मूर्ति हो तो नए वस्त्र आभूषण पहनाएं।
इसके पश्चात अखंड दीपक जलाएं और मिट्टी की बेदी या गमले में जौ बोएं।
प्रश्न आता है कि जौ क्यों बोया जाता है?
इसकी गहराई में का कर मुझे निम्नलिखित कारण ज्ञात हुए:
1. सृष्टि रचना के बाद पहली फसल जो उगी वो जौ थी।
2. जो  स्वयं ब्रह्म स्वरूप होता है और यह हमको अन्न के प्रति हमारी संस्कृति का द्योतक है कि अन्न का सम्मान करना चाहिए।
3. जौ बहुत पवित्र माना जाता है और समस्त यज्ञों में प्रयुक्त होता है।
4. एक व्यावहारिक पक्ष है कि नवरात्र में हमको कठोर नियम पालन करने होते हैं ताकि हम दुर्गासप्तशती का पारायण कर सकें और ध्यान देवी की भक्ति पर लगा रहे इसलिए हमको एक बंधन में बांधने के लिए यह परंपरा बनाई गई है।
5. जौ हमको आने वाले समय का आभास कराते हैं। अगर अच्छे जौ उगे तो संपन्नता और देवी का आशीर्वाद है और अगर जौ सड़ गए या अच्छे से नहीं जमें तो इसका तात्पर्य है कि हमारी भक्ति में कोई कमी है अथवा आने वाले समय में किसी अनिष्ट की संभावना है।

जागृत दुर्गासप्तशती का पारायण तुरन्त फलदायक:

मार्कण्डेय पुराण के 700 मंत्रो का संकलन दुर्गा सप्तशती है जिससे पहले हमको शप्त श्लोकी दुर्गा, दुर्गाअष्टोत्तर नाम, कवच, अर्गला और कीलक का पाठ करना चाहिए। इनके पश्चात हमको शुद्धता पूर्वक करना चाहिए। उचित होगा कि अच्छे कर्मकांडी पंडित जी से परायण करवाएं। अंत में सिद्ध कुंजिकास्तोत्र का पाठ करें।
जो लोग बाकी पाठ ना कर पाएं वो कम से कम सिद्ध कुंजिकास्तोत्र का पाठ अवश्य करें क्योंकि इसका पाठ करने पर दुर्गा सप्तशती पाठ के बराबर फल मिलता है।
दुर्गासप्तशती के मंत्र जागृत हैं इसलिए तुरन्त फलदायक होते हैं लेकिन साथ ही साथ हमको मंत्र को पढ़ने में अतिरिक्त सावधानी रखनी चाहिए ताकि गलत ना हो क्योंकि गलत पढ़ने पर नुक़सान ही होगा। इसलिए अगर संभव ना हो तो हिंदी या अंग्रेजी में पाठ करें।

शुद्धता के विषय में देवी भागवत में कहा गया है:

“द्रव्य शुद्धि क्रिया शुद्धिर्मन्त्र शुद्धिश्च भूमिप।
भवेद्यदि तदा पूर्णं फलं भवति नान्यथा॥”

यदि द्रव्यशुद्धि, क्रियाशुद्धि और मन्त्र शुद्धि के साथ कर्म सम्पन्न होता है, तब पूर्ण फलकी प्राप्ति अवश्य होती है; अन्यथा नहीं होती। (३।१२।७)

इस नवरात्रि के दौरान तीन स्वार्थ सिद्धि योग 18 अक्टूबर, 19 अक्टूबर और 23 अक्टूबर को बन रहा है। वहीं, एक त्रिपुष्कर योग 18 अक्टूबर को बन रहा है। जो कि अत्यंत शुभ है।

नवमी और दशमी एक दिन

इस बार नवमी और दशमी एक ही दिन मनायी जाएगी। 25 अक्टूबर को सुबह 11 बजकर 14 मिनट तक नवमी मनायी जाएगी। 11 बजकर 14 मिनट के बाद हवन के साथ विजयादशमी मनायी जाएगी। इसके बाद शाम को दशहरा मनाया जाएगा।

हवन अष्टमी को करें या नवमी तिथि को करें?

बहुत लोगों के मन में यह शंका होती है कि किस दिन हमको हवन करना चाहिए? इसके लिए मेरी सलाह है कि जैसा आपके परिवार में परम्परा चली आ रही हो वैसा करिए। अगर आप शास्त्रीय मत के लिए पूछेंगे तो मैं आपको नवमी के दिन हवन की सलाह दूंगा क्योंकि नवरात्र में नौ दिन की पूजा के बाद है जौ काट के हवन करना चाहिए और जौ को देवी के आशीर्वाद स्वरूप ग्रहण करना चाहिए।

तिथि और मां का पूजन :

17 अक्टूबर – प्रतिपदा – घट स्थापना और शैलपुत्री पूजन

18 अक्टूबर – द्वितीया – मां ब्रह्मचारिणी पूजन

19 अक्टूबर – तृतीया – मां चंद्रघंटा पूजन

20 अक्टूबर – चतुर्थी – मां कुष्मांडा पूजन

21 अक्टूबर – पंचमी – मां स्कन्दमाता पूजन

22 अक्टूबर – षष्ठी – मां कात्यायनी पूजन

23 अक्टूबर – सप्तमी – मां कालरात्रि पूजन

24 अक्टूबर – अष्टमी – मां महागौरी पूजन

25 अक्टूबर – नवमी, दशमी – मां सिद्धिदात्री पूजन व विजया दशमी

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पंडित पुरूषोतम सती ( Astro Badri)
Greater Noida West
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