September 27, 2021

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क्यों रखते हैं श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर गृहस्थ और आश्रम वाले व्रत, जाने क्या दुर्लभ संयोग है इस बार

प्रायः हर वर्ष हम सभी सुनते हैं कि श्री कृष्ण जन्माष्टमी दो दिन मनाई जा रही है लेकिन इस साल आपको ऐसा नहीं सुनाई दे रहा होगा। मैं आपको बताता हूं कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी शास्त्र अनुसार कब मनाई जानी चाहिए?  हर साल ये दो दिनों की दुविधा क्यों होती है? आखिर इस महत्वपूर्ण पर्व के दो दिन होने का क्या कारण होता है? इस बार क्यों नहीं है ये दुविधा? और आख़िर क्या विशेषता होती है श्रीकृष्ण जन्माष्टमी की?  2021 में कब होगी श्री कृष्ण जन्माष्टमी?

कब हुआ था भगवान का जन्म?

पुराणों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्य रात्रि में हुआ था जब रोहिणी नक्षत्र और वृषभ लग्न था।

जन्माष्टमी को मनाने वाले दो समुदाय अलग अलग तिथियों में श्रीकृष्ण का प्राकट्योत्सव मनाते हैं। सनातन धर्म में अनुयाइयों को उनकी भक्ति, विश्वाश और पूजन विधि के अनुसार 5 संप्रदायों में विभाजित किया गया है जिसमें  1. वैष्णव, 2. शैव, 3. शाक्त, 4 स्मार्त और 5. वैदिक संप्रदाय आता है।

वैष्णव जो विष्णु को ही परमेश्वर मानते हैं। शैव जो शिव को ही परमेश्वर मानते हैं। शाक्त जो देवी को ही परमशक्ति मानते हैं और स्मार्त जो परमेश्वर के विभिन्न रूपों को एक ही समान मानते हैं  और सभी देवताओं की पूजा करते हैं, जिसमें अधिकतर लोग आते हैं। गृहस्थ आश्रम को स्वीकार करने वाला व्यक्ति स्मार्त है क्योंकि वो सभी की पूजा करता है।अंत में वे लोग जो ब्रह्म को निराकार रूप जानकर उसे ही सर्वोपरि मानते हैं अर्थात वेदों को ही मानते हैं और  पुराणों को नहीं मानते है। हालांकि सभी सम्प्रदायों का धर्मग्रंथ वेद ही है क्योंकि वेदों से ही आगे पुराणों का प्रतिपादन हुआ परन्तु भगवान श्री कृष्ण के जन्म को लेकर वैष्णव और स्मार्त के दृष्टिकोण में अंतर है।

जैसे कि सभी जानते हैं कि भगवान श्री कृष्ण का जन्म विषम परिस्थितियों में हुआ था और कंस द्वारा माता देवकी के सभी संतानों को नष्ट किया जा रहा था। स्मार्त लोग भगवान् के पैदा होने से पहले व्रत रखते हैं ताकि भगवान का जन्म माता देवकी के गर्भ से सकुशल हो। इसी सकुशलता के लिए ही व्रत धारण किया जाता है और मध्य रात्रि में जन्म होने के उपरांत ही भोजन किया जाता है इसलिए स्मार्त लोगों को कृष्ण जन्माष्टमी उस दिन मनानी चाहिए जिस दिन रात्रि में अष्टमी तिथि हो।

वैष्णव संप्रदाय के अनुयाई भगवान् के जन्म के उपरांत भगवान का प्राकट्योत्सव मनाते हैं क्योंकि भगवान के जन्म के बाद भगवान रात में ही गोकुल पहुंच गए तो सुबह जब सबको पता चला कि भगवान का जन्म हो चुका है और भगवान सकुशल हैं तो सभी वैष्णवों और गोकुल वासियों ने भगवान का प्राकट्योत्सव मनाया इसीलिए वैष्णव भगवान का प्राकट्योत्सव आज भी उसी परंपरा के अनुसार मनाते हैं जब अष्टमी उदय तिथि हो अर्थात सूर्य उदय के समय जब अष्टमी तिथि हो।

धर्मसिंधु भी इस तथ्य को प्रमाणित करता है कि स्मार्त व वैष्णव लोगों में इस पर्व के निर्णायक तत्त्व पृथक हैं।

स्मार्तानां गृहिणी पूर्वा पोष्या, निष्काम वनस्थेविधवाभिः वैष्णवैश्च परै वा पोष्या। वैष्णव वास्तु अर्धरात्रिव्यापिनीमपि  रोहिणीयुतामपि सप्तमी विद्धां अष्टमी परित्यज्य नवमी युतैव ग्राह्या॥” (धर्मसिन्धु)

इसी को आधार मानते हुए  वर्ष 2021 में दोनों संप्रदाय यानि स्मार्त संप्रदाय  यानी गृहस्थ और वैष्णव सम्प्रदाय 30 अगस्त को भगवान के जन्म का उत्सव मनाएंगे।

जन्माष्टमी पर गृहस्थों द्वारा व्रत का कारण:

स्मार्त लोग भगवान् के पैदा होने से पहले व्रत रखते हैं ताकि भगवान का जन्म माता देवकी के गर्भ से सकुशल हो। इसी सकुशलता के लिए ही व्रत धारण किया जाता है और मध्य रात्रि में जन्म होने के उपरांत ही भोजन किया जाता है इसलिए स्मार्त लोगों को कृष्ण जन्माष्टमी उस दिन मनानी चाहिए जिस दिन रात्रि में अष्टमी तिथि हो।

 दोनों संप्रदायों के एक साथ जन्माष्टमी मनाने का कारण:

नियम के अनुसार जिस दिन मध्यरात्रि में भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी हो उस समय स्मार्त समुदाय को भगवान के जन्म समझना चाहिए। 29 अगस्त को रात्रि 11 बजकर 24 मिनट से अष्टमी तिथि का प्रारंभ हो रहा है जो 31 अगस्त की सुबह 2 बजे तक रहेगी। क्योंकि 30 की मध्यरात्रि को अष्टमी तिथि का योग है इसलिए 30 को जन्माष्टमी मनाई जाएगी।

वैष्णव क्योंकि भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं जब भगवान मथुरा से गोकुल पहुंच गए थे इसलिए जिस दिन सूर्योदय के समय अष्टमी तिथि होगी उस दिन जन्मोत्सव मनाया जायेगा। क्योंकि 30 की सुबह सूर्योदय अष्टमी तिथि में हो रहा है इसलिए वैष्णव सम्प्रदाय भी भगवान का जन्मोत्सव 30 अगस्त को मनाएंगे।

श्री कृष्ण जन्म की कथा:

भाद्रपद कृष्ण अष्टमी तिथि की घनघोर अंधेरी आधी रात को रोहिणी नक्षत्र में मथुरा के कारागार में वसुदेव की पत्नी देवकी के गर्भ से भगवान श्रीकृष्ण ने जन्म लिया था।

द्वापर युग में भोजवंशी राजा उग्रसेन मथुरा में राज्य करता था। उसके आततायी पुत्र कंस ने उसे गद्दी से उतार दिया और स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा। कंस की एक बहन देवकी थी, जिसका विवाह वसुदेव नामक यदुवंशी सरदार से हुआ था। विवाह के पश्चात कंस अपनी बहन देवकी को उसकी ससुराल पहुंचाने जा रहा था।

रास्ते में आकाशवाणी हुई- ‘हे कंस, जिस देवकी को तू बड़े प्रेम से ले जा रहा है, उसी में तेरा काल बसता है। इसी के गर्भ से उत्पन्न आठवां बालक तेरा वध करेगा।’ यह सुनकर कंस वसुदेव और देवकी को मारने के लिए उद्यत हुआ।

तब देवकी ने उससे विनयपूर्वक कहा- ‘मेरे गर्भ से जो संतान होगी, उसे मैं तुम्हारे सामने ला दूंगी। हमको मार के क्या लाभ मिलेगा कंस ने देवकी की बात मान ली एवं वसुदेव और देवकी को कारागृह में डाल दिया। वसुदेव-देवकी के एक-एक करके सात बच्चे हुए और सातों को जन्म लेते ही कंस ने मार डाला। जब आठवां बच्चा होने वाला था। कारागार में उन पर कड़े पहरे बैठा दिए गए। उसी समय गोकुल में नंद की पत्नी यशोदा को भी बच्चा होने वाला था। जिस समय वसुदेव-देवकी को पुत्र पैदा हुआ, उसी समय संयोग से यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो और कुछ नहीं सिर्फ ‘माया’ थी।

जिस कोठरी में देवकी-वसुदेव कैद थे, उसमें अचानक प्रकाश हुआ और उनके सामने शंख, चक्र, गदा, पद्म धारण किए चतुर्भुज भगवान प्रकट हुए। दोनों भगवान के चरणों में गिर पड़े। तब भगवान ने उनसे कहा- ‘अब मैं पुनः नवजात शिशु का रूप धारण कर लेता हूं।

तुम मुझे इसी समय अपने मित्र नंदजी के घर वृंदावन में भेज आओ और उनके यहां जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस के हवाले कर दो। इस समय वातावरण अनुकूल नहीं है। फिर भी तुम चिंता न करो। जागते हुए पहरेदार सो जाएंगे, कारागृह के फाटक अपने आप खुल जाएंगे और उफनती अथाह यमुना तुमको पार जाने का मार्ग दे देगी।’

उसी समय वसुदेव नवजात शिशु-रूप श्रीकृष्ण को सूप में रखकर कारागृह से निकल पड़े और अथाह यमुना को पार कर नंदजी के घर पहुंचे। वहां उन्होंने नवजात शिशु को यशोदा के साथ सुला दिया और कन्या को लेकर मथुरा आ गए। कारागृह के फाटक पूर्ववत बंद हो गए।

अब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव-देवकी को बच्चा पैदा हुआ है। उसने बंदीगृह में जाकर देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीनकर पृथ्वी पर पटक देना चाहा, परंतु वह कन्या आकाश में उड़ गई और वहां से कहा- ‘अरे मूर्ख, मुझे मारने से क्या होगा? तुझे मारनेवाला तो वृंदावन में जा पहुंचा है। वह जल्द ही तुझे तेरे पापों का दंड देगा।’ सुबह गोकुल में जब साधु संतो को इस बात का पता चलता है कि भगवान का जन्म हो चुका है तब सभी मिलकर गोकुल में भगवान का जन्मोत्सव धूमधाम से मनाते हैं

जन्माष्टमी 2021 विशेष है ?

वैसे तो श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक महत्वपूर्ण पर्व है क्योंकि भगवान विष्णु के पूर्णावतार के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म का पर्व है। भगवान का जन्म  भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रोहिणी नक्षत्र में हुआ था जब चंद्रमा वृषभ राशि में थे और जन्मसमय में वृषभ राशि उदित हो रही थी।

परन्तु इस साल श्री कृष्ण जन्माष्टमी निशीथ व्यापिनी अष्टमी का चंद्रोदय के समय रोहिणी नक्षत्र से योग होने पर श्री कृष्ण जन्माष्टमी को श्री कृष्ण जयंती योग का निर्माण हो रहा है जो की एक दुर्लभ उत्तम संयोग है जो शताब्दी बाद बन रहा है।

पूजा का शुभ मुहूर्त-

30 अगस्त को रात 11 बजकर 59 मिनट से देर रात 12 बजकर 44 मिनट तक है।

कृष्ण जन्माष्टमी पारण मुहूर्त-

  • कृष्ण जन्माष्टमी के व्रत में रात्रि को लड्डू गोपाल की पूजा- अर्चना करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण कर व्रत का पारण किया जाता है। हालांकि कई लोग व्रत का पारण अगले दिन भी करते हैं।

रोहिणी नक्षत्र के समापन के बाद किया जाता है व्रत पारण

  • कई लोग रोहिणी नक्षत्र के समापन के बाद भी व्रत का पारण करते हैं।

व्रत पारण समय-

  • 31 अगस्त को सुबह 9 बजकर 44 मिनट बाद व्रत का पारण कर सकते हैं।

रोहिणी नक्षत्र प्रारंभ– 30 अगस्त को सुबह 06 बजकर 36 मिनट से
रोहिणी नक्षत्र समापन– 31 अगस्त को सुबह 09 बजकर 43 मिनट पर।

 

पंडित पुरूषोतम सती

Greater Noida West

9450002990

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