October 24, 2021

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विश्वप्रसिद्ध महिला कार्यकर्ता कमला भसीन का निधन! जानें कौन थी आज़ादी के नारे को भारत लाने वाली ये महिला

मशहूर महिला अधिकार कार्यकर्ता, कवियत्री और लेखिका कमला भसीन ने शनिवार को अपनी अंतिम सांस ली। उनकी उम्र 75 वर्ष की थी। एक्टिविस्ट कविता श्रीवास्तव ने ट्वीट कर बताया कि भसीन का तड़के करीब 3 बजे निधन हो गया।

 

Kamla Bhasin/Twitter

 

भारत और अन्य दक्षिण एशियाई देशों में महिला आंदोलन में भसीन एक प्रमुख आवाज़ रही हैं।
कविता श्रीवास्तव ने ट्वीट कर कहा, “कमला भसीन, हमारी प्यारी दोस्त का, आज 25 सितंबर को तड़के 3 बजे के आसपास निधन हो गया। यह भारत और दक्षिण एशियाई क्षेत्र में महिला आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका है। उन्होंने जीवन की विपरीत परिस्थितियों में उसे ज़िंदादिली के साथ जिया। कमला आप हमेशा हमारे दिलों में ज़िंदा रहेंगी।”

 

कौन हैं कमला भसीन?

1970 के दशक से भारत और दक्षिण एशिया में महिलाओं के अधिकारों की मुखर चैंपियन कमला को संगत: ‘ए फ़ेमिनिस्ट नेटवर्क’ और उनकी कविता ‘क्यूंकी मैं लड़की हूं, मुझे पढ़ना है’ के साथ उनके काम के लिए जाना जाता है।

पंजाब के शहीदनवाली गांव में जन्मीं कमला ने खुद को ‘मिडनाइट जनरेशन’ में से एक के रूप में संदर्भित किया। राजस्थान से स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी करने के बाद, उन्होंने पश्चिम जर्मनी के मुंस्टर विश्वविद्यालय में ‘विकास के समाजशास्त्र’ का अध्ययन करने के लिए एक फ़ेलोशिप जीती।

लौटने पर, उन्होंने राजस्थान के सेवा मंदिर में काम करना शुरू किया, जहाँ वह अपने भावी पति, दिवंगत पत्रकार और कार्यकर्ता बलजीत मलिक से मिलीं।

 

Kamla Bhasin/@vintananda twitter

 

उन्होंने हमेशा कहा कि फ़ेमिनिज्म पुरुषों और महिलाओं के बीच की लड़ाई नहीं है, बल्कि पितृसत्ता की विचारधारा के ख़िलाफ़ युद्ध है, यानी दो विचारधाराओं का टकराव।

उन्होंने समाचार एजेंसी हिंदुस्तान टाइम्स को बताया था, “एक जो पुरुषों को ऊपर उठाता है और उन्हें शक्ति देता है, और दूसरा, जो समानता की वकालत करता है!”

 

भारत में लाईं आज़ादी का नारा

भसीन भारत में ‘आज़ादी’ का नारा लेकर आईं, जिसका इस्तेमाल पाकिस्तानी फेमिनिस्ट्स ने पहले ज़िया-उल-हक़ के शासन के ख़िलाफ़ किया था।

फ़रवरी 2019 में, भसीन ने द क्विंट को बताया था कि उन्होंने पहली बार 1984 में पाकिस्तान में फेमिनिस्ट्स के बीच ‘आज़ादी’ का नारा सुना था, जो ज़िया-उल-हक़ के शासन के ख़िलाफ़ मुखर थीं।

 

Kamla Bhasin/ @vintananda twitter

 

“35 साल पहले, मैं पाकिस्तान गई थी। उस समय पाकिस्तान पर ज़िया-उल-हक़ का शासन था। ज़िया-उल-हक़ के ख़िलाफ़ जो पहला समूह खड़ा हुआ, वह कोई राजनीतिक दल नहीं था, वो पाकिस्तानी नारीवादियों(फेमिनिस्ट्स) का एक समूह था। मैंने ऐसी ही एक सभा देखी, और वहीं पर उन्होंने इस नारे को बुलंद किया।”

उन्होंने नारा लगाया-

“औरत का नारा – आज़ादी

बच्चों का नारा – आज़ादी

हम लेके रहेंगे – आज़ादी

है प्यारा नारा – आज़ादी”

 

किताबें और काम

कमला भसीन 1975 से बैंकॉक में संयुक्त राष्ट्र खाद्य और कृषि संगठन के साथ काम करने के चार साल के कार्यकाल के बाद, भारत लौट आईं, जहां उन्होंने महिला आंदोलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, और भयावह मथुरा बलात्कार मामले के बाद उसके ख़िलाफ़ खड़ी हुईं, जहां दो पुलिसकर्मियों ने पुलिस स्टेशन में एक दलित महिला के साथ बलात्कार किया था।

 

Kamla Bhasin/twitter

 

इस आंदोलन ने भारत में बलात्कार पर क़ानून में महत्वपूर्ण बदलाव किए। वह 2002 तक संयुक्त राष्ट्र के साथ काम करती रहीं। भसीन ने दक्षिण एशियाई नारीवादी आंदोलन(South Asian Feminist Movement) में कई महत्वपूर्ण किताबें लिखीं, जिनमें ‘अंडरस्टैंडिंग जेंडर’, ‘व्हाट इज पैट्रिआर्की’, और ‘बॉर्डर्स एंड बाउंड्रीज़: हाउ वीमेन एक्सपीरियंस द पार्टिशन ऑफ़ इंडिया’ (रितु मेनन के साथ उत्तरार्द्ध) शामिल हैं।

उनके काम ने बताया कि किस तरह जन्मजात न होते हुए पितृसत्ता ने पुरुष और महिला के बीच भेदभाव को सींचा है।

भसीन की शादी एक्टिविस्ट और पत्रकार मलिक से लगभग तीन दशकों तक रही। उसके बाद जब वह उनके साथ शारीरिक रूप से हिंसक होने लगे तो भसीन ने उन्हें तलाक दे दिया।

2006 में उनकी बेटी मीतो का निधन हो गया था और अब उनके परिवार में उनके बेटे नीत कमल हैं, जिनके साथ वह नई दिल्ली में रहती थीं।

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